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IPS मयंक श्रीवास्तव का लेख “सत्य: एक दर्शन- सच्ची बात कही थी मैंने, लोगों ने सूली पे चढ़ाया, मुझको ज़हर का जाम पिलाया” जमकर हो रहा वायरल, आप भी पढ़े यह बेहतरीन लेख

भिलाई। छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर मयंक श्रीवास्तव का फेसबुक पर लिखा हुआ लेख “सत्य: एक दर्शन” सुर्खियों में है। इस लेख की लोग बहुत ही सराहना कर रहे है। कुछ ही घंटों पहले पोस्ट की गई इस लेख पर 100 से ज्यादा ने लोगो ने अपनी प्रतिक्रिया दी है वही करीब 500 लोगो ने इस लेख को लाइक किया है। इसके पूर्व भी आईपीएस मयंक श्रीवास्तव द्वारा लिखा हुआ लेख ट्रक भर के मासूमियत  को लोगो ने बहुत सराहा था उस लेख पर करीब 200 कॉमेंट्स 700 लाइक मिले थे। आप भी पढ़े यह बेहतरीन लेख….

सत्य: एक दर्शन
सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढ़ाया
मुझको ज़हर का जाम पिलाया
फिर भी उनको चैन न आया
शायरों को लगता है कि वो हमेशा सच्ची बात कहते हैं, और वो सच्ची बातें लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा होता है क्या? मतलब, शायरों को छोड़कर, बाक़ी सब सच्ची बातों को न सिर्फ नहीं जानते, बल्कि मानते भी नहीं, बल्कि इस तीव्रता से नहीं मानते कि “सच्ची बात” बोलने वाले को बहिष्कृत कर देंगे या नुकसान कर देंगे उसका? ऐसा कैसे हो सकता है?

जो सच्ची बात थी वो मैं ने बरमला कह दी
यूँ अपने दोस्तों से मैं ने दुश्मनी कर ली (बरमला: सरेआम, मुंह पर)
इतने, इतने सारे, लोगों के बीच में सच जानने वाले इतने कम? और उनको मानने वाले लगभग कोई नहीं? मुश्किल है यक़ीन करना शायर साहेब! हो सकता है आपके सच बोलने का तरीक़ा न अच्छा रहा हो! या वो, वो सच रहा हो, जो सिर्फ आपने देखा, दूसरों ने दूसरा सच देखा हो! भगवन बुद्ध को वह मशहूर दृष्टांत याद है न, वो हाथी और अंधों वाला (पाली तिपिटक:सुत्त पिटक:खुद्दक निकाय:उदान: “जच्चंधवग्ग” (=जनुषांध=जन्म से अंधा))? एक राज्य के राजा ने अपने राज्य के सभी जन्मान्धों को बुलाया, ज़ाहिर है कि उन्होंने हाथी कभी देखा या महसूस नहीं किया था।

एक दीर्घकाय हाथी को वो अंधे व्यक्ति विभिन्न स्थानों से छूए, देखे और फिर राजा ने उनसे पूछा कि हाथी क्या है, बताओ. उन अंधे व्यक्तियों में से जिसने हाथी के पैर देखे उसने उसे खंभे जैसा, जिसने कर्ण देखे उसने सूप जैसा, जिसने सूंड देखी उसने हल की मूठ जैसा, जिसने दांत देखे उसने हल के फल जैसा, सर देखने वाले ने बड़े बर्तन की तरह, पेट देखने वाले ने अनाज-भण्डार की तरह आदि आदि बताया. वो सब, यहाँ तक कि, आपस में लड़ने लगे कि जो उन्होंने महसूस किया है, वही सही है, बाक़ी सब झूठ बोल रहे हैं. शाक्यमुनि ने कहा था कि संपूर्ण सत्य किसी ने नहीं जाना, वो सत्य का थोडा हिस्सा जानते थे, और उसी को सत्य समझते थे. ऋग्वेद में भी कहा है- “एकं सद्विप्रा बहु॒धा वदन्ति”- सत्य एक ही है, विद्वज्जन उसे अलग अलग नामों से बुलाते हैं (1:164:46). फिर एक व्यक्ति विशेष सही जान रहा है, अन्य नहीं जान रहा, ये कहना कितना सही है? तुमने जो सत्य समझा शायर महोदय, सत्य होगा, पर दुसरे ने जो सत्य देखा, वो असत्य नहीं; तुम्हारा सत्य ही सत्य नहीं, संपूर्ण नहीं; हो सकता है, न?
सत्य: एक दृष्टान्त- दूसरे पोस्ट में………..

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