भिलाई। छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर मयंक श्रीवास्तव के द्वारा लिखा हुआ लेख “सत्य एक दर्शन” के पार्ट-2 सत्यः एक दृष्टांत को फेसबुक पर बहुत ही सराहा जा रहा है, महज 17 घण्टे के पोस्ट समय पर 50 कमेंट्स और 317 से ज्यादा लाइक्स मिल चुके है। वही “सत्य एक दर्शन” लेख के पार्ट-1 को भी बहुत सराहा गया था जिस पर 600 से ज्यादा लाइक्स, 140 कमेंट्स मिले थे वही 5 लोगो ने इस पोस्ट को शेयर किया था। आप भी पढ़े ये शानदार लेख…
“सत्य: एक दर्शन” के आगे क्रमशः
सत्यः एक दृष्टांत
सूरज क्षितिज पे उगते हुए ऐसा लग रहा था जैसे किसी किशोर के पहले प्यार वाली लड़की के गोरे माथे पे बड़ी सी लाल बिंदी। सुबह की ताज़ी, ठंडी हवा चेहरे को बड़ी कोमलता से स्पर्श कर रही थी। आँख में जब ऐसी हवा लगती है तो लगता है कि थकी आँखों से अब थकान उतर गई हो। जब रात भर काम किया हो आँखों ने और दिमाग़ ने, तो सुबह का ऐसा हसीन मौसम बहुत सुकून भरा होता है। फिर ईड ने सोचा कि जब काम ऐसा हो जाए कि लगे कि काम किया है, ऐसे स्तर का किया है जैसी अपनी आकांक्षा है, तब वैसे भी सब अच्छा लगता है। और ईड मुस्कुराने लगा, रात भर जाग कर काम करने की थकान के बावजूद, नींद नहीं थी आखों में, शायद ह्रदय में संतोष अधिक था, इसलिये।
काम बहुत बड़ा था, कम से कम इस सेन्स में कि आठ-दस हज़ार लोगों, और वो भी वृद्ध, को एक पहाड़ी प्रदेश से, जहाँ वो एक प्राकृतिक आपदा में फँस गये थे, ले आना और वो भी सरकारी साधनों से। लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा थी और काम करने वाले लोग बहुत कम थे। हालाँकि ईड को यक़ीन था कि प्लान बहुत अच्छा बना था, एक एक चीज़ का ख़्याल रखा गया था, लेकिन उसको ये भी डर था कि यदि साथ जाने वाले लोगों ने समझाये गये नियमों का पालन नहीं किया तो मुश्किल भी हो सकती है, क्योंकि इतने सारे कारकों पर नियंत्रण कर पाना आसान नहीं था, इतने लोगों को और इतने सारे संसाधनों को, इतने लंबे समय तक, कम लोगों के द्वारा मैनेज करना इतना आसान भी नहीं था। उसकी आशंका सही भी हुई, कुछ तो कर्मचारियों ने नियम पालन नहीं किया, कुछ रास्ते में भी समस्याएँ आँईं और सफ़र लंबा था तो कई स्थानों पे संचार नहीं हो सकता था। निर्धारित समय सीमा के अंदर कुछ निर्धारित स्थान पर लोग नहीं पहुँच पाए। इंतज़ार कर रहे कर्मचारी भी अधीर हो रहे थे। और जब मन अधीर हो और कार्य में देर हो तो थोड़ी देर भी बहुत ज़्यादा लगती है, फिर व्यक्ति ये नहीं सोचता कि कारण क्या होंगे? ईड को कई बार फ़ोन आया कि कहाँ हैं वृद्धजन, हम लोग बहुत देर से इंतज़ार कर रहे हैं? परंतु सूचना नहीं मिल पा रही थी। और अधीरता के भँवर को जब सूचना रूपी नियंत्रण नहीं मिलता है तो ये भँवर बवंडर बन जाता है।
सुपरएगो को गुमान था कि वो सच बोलने का साहस रखने वाले स्पष्टवादी है। इस अवसर ने उसे “सच” बोलने पर जैसे मजबूर कर दिया। सुपरएगो ने ईड को फ़ोन लगाया और भड़भड़, मुहावरे के अनुरूप, सब “कड़वे” सच का कड़वापन उलट दिया। सुपरएगो ने उसे बोला कि बाक़ी लोग नहीं बोलेंगे पर वो सच बोलेगा और सच ये है कि प्लान बहुत बेकार बना था, कौन कब आएगा, किसको क्या सूचना देगा, इनका कुछ अतापता नहीं है। सुपरएगो के बग़ल में उस समय ईगो भी बैठा था। प्रतीक्षा की अधीरता के क्षणों में ये दोनों बात कर रहे थे कि क्या बकवास प्लान बना है, देखो कितनी देर से इंतज़ार कर रहे हैं। ईड ईगो का दोस्त था इसलिए उसमें अप्रिय “सच” कहने की न हिम्मत थी, न आदत, न ही ऐटीट्यूड था। सुपरएगो को, मगर, अपने ही द्वारा बनाई गई छवि को जीने का मौक़ा मिल गया। भड़ास भी निकालनी थी। जब हम अधिकतम ऐसे लोगों के बीच होते हैं, जो अप्रिय कहना पसंद नहीं करें, या जिनकी आदत ना हो, जिन्होंने सौम्यता को मूल्य समझा /बचपन से समझाया गया हो, या जिनकी मजबूरी हो कि एक परिस्थिति विशेष में वो अप्रिय कह नहीं सकते, ऐसे में यदि आपमें अप्रिय कहने का साहस हो, तो इसे विशेष सकारात्मक गुण मान लेते हैं लोग। ये एहसास भी सुपरएगो को प्रेरित किया, जैसे उसने जीवन के खेल में एक पॉइंट स्कोर कर लिया हो, जैसे वो अपने आभासी प्रतिद्वन्दियों से बहुत आगे निकल गया हो।
सच को देखने का, समझने का और “कह डालने” का ये तरीक़ा हमारी आँख खोलता है, या हमें अंधा करता है? क्या कहने से पहले हमने ‘सच’ के सारे पहलुओं को देखा, विश्लेषण किया, या इतना भी हिसाब लगा पाए कि इस एक घटना में पहलू कितने और किन प्रकारों के हो सकते हैं। हमें “सच कहने” की जल्दी रहती है। जैसा स्वामी वरुण जी ने कहा था न कि, “लोगों को न्याय करने की नहीं निर्णय करने की आदत, और ‘तत्परता’, रहती है। न्याय गम्भीर, दुरूह, दीर्घ और गहन सत्यान्वेषण की प्रक्रिया और परिणाम है। निर्णय, परंतु, जिनपे वह निर्णय कर रहा हो उनके मुक़ाबले निर्णयकर्ता के स्वयं के, तुलनात्मक रूप से सुरक्षित, आरामदायक, वरिष्ठ स्थिति में होने की, या जिस क्रिया विशेष को वह जज कर रहा है, उसको करने की स्थिति में स्वयं के न होने से, उपजी परिस्थितिकी (ecology) में बनाया गया, दृष्टिकोण होता है।” और, ओह, इतना सरल, तत्क्षण और तीव्र होता है, किसी को ‘जज’ करना। हम निर्णय को न्याय की तरह प्रस्तुत कर देते हैं। अप्रिय कहने के साहस से, सत्य के “एक” पहलू को “सम्पूर्ण सत्य” बता कर प्रस्तुत कर देने से, हम सम्भवतः उन कई असाहसी लोगों के मध्य अपने में एक प्रकार का सेल्फ़ ऐक्चूयलायज़ेशन महसूस करते हों, एक श्रेष्ठता का भाव प्राप्त कर लेते हों।
एक क्षण में ही जैसे ईड के मन में ये विचार आते गए, जाते गए। ईड ने महसूस कर लिया था कि सुपरएगो के बग़ल में ईगो भी बैठा है। शाम हो चली थी अब तक, बिलकुल जैसे साहित्यिक प्रतीकों में होती है, शाम। उसकी आँखों के आगे अंधेरा गहराता जा रहा था, हवा धूल से भरी और उमस बरसा रही थी, सूरज क्षितिज पर नहीं, शहर के गंदे काले धुँवे के पीछे अस्त हो रहा था।












