नफरत भरे भाषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्ती दिखाई है और राज्यों को केस दर्ज करने का आदेश दिया है फिर चाहे वो किसी भी धर्म का हो…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सांप्रदायिक आधार भड़काऊ बयान देने वाला जिस भी धर्म का हो, उस पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए. कोर्ट ने पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड सरकार को दिए आदेश को सभी राज्यों पर लागू कर दिया है. तब कोर्ट ने कहा था कि ऐसे बयानों पर पुलिस खुद संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज करे. इसके लिए किसी की तरफ से शिकायत दाखिल होने का इंतज़ार न किया जाए. कोर्ट ने यह भी कहा था कि कार्रवाई करने में कोताही को अवमानना माना जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के मामले में सख्ती दिखाई है. कोर्ट ने शुक्रवार 28 अप्रैल को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ मामला दर्ज करने निर्देश दिया है. उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भले ही कोई शिकायत दर्ज की गई हो अथवा नहीं की गई हो लेकिन प्रशासन को मामला दर्ज करना ही है.
जस्टिस के एम जोसफ और बी वी नागरत्ना की पीठ ने नफरत फैलाने वाले भाषणों को ‘‘गंभीर अपराध बताया जो देश के धार्मिक तानेबाने को नुकसान पहुंचा सकते हैं.’’ पीठ ने कहा कि उसका 21 अक्टूबर, 2022 का आदेश सभी क्षेत्रों के लिए प्रभावी रहेगा. साथ ही चेतावनी दी कि मामले दर्ज करने में किसी भी देरी को अदालत की अवमानना माना जाएगा.
21 अक्टूबर को हुई सुनवाई में जस्टिस के एम जोसेफ और ऋषिकेश रॉय की बेंच से याचिकाकर्ता शाहीन अब्दुल्ला ने कहा था कि मुसलमानों के खिलाफ लगातार हिंसक बयान दिए जा रहे हैं, इससे डर का माहौल है. तब बेंच के सदस्य जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने कहा था, “क्या ऐसे भाषण सिर्फ एक तरफ से ही दिए जा रहे हैं? क्या मुस्लिम नेता नफरती बयान नहीं दे रहे? आपने याचिका में सिर्फ एकतरफा बात क्यों कही है?” इस पर याचिकाकर्ता के लिए पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि जो भी नफरत फैलाए, उस पर कार्यवाही होनी चाहिए.
शिकायत का इंतजार न करें इसके बाद जस्टिस जोसफ ने फैसला लिखवाते हुए कहा था, “IPC में वैमनस्य फैलाने के खिलाफ 153A, 295A, 505 जैसी कई धाराएं हैं लेकिन अगर पुलिस उनका उपयोग न करे तो नफरत फैलाने वालों पर कभी लगाम नहीं लगाई जा सकती. हम दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को निर्देश दे रहे हैं कि वह ऐसे मामलों में तुरंत केस दर्ज कर उचित कानूनी कार्रवाई करें. इसके लिए किसी शिकायत का इंतज़ार न करें.”
आज जस्टिस के एम जोसफ और बी वी नागरत्ना की बेंच ने मामला सुना. इस बेंच ने अक्टूबर में दिए आदेश को सभी राज्यों पर लागू कर दिया. मामले पर अगली सुनवाई 12 मई को होगी.
शीर्ष अदालत ने पहले उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड को निर्देश दिया था कि घृणा फैलाने वाले भाषण देने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए. तब न्यायालय ने कहा था, ‘‘धर्म के नाम पर हम कहां पहुंच गए हैं?’’ इसके बाद पीठ ने शुक्रवार को कहा, ‘‘न्यायाधीश अराजनीतिक होते हैं और पहले पक्ष या दूसरे पक्ष के बारे में नहीं सोचते और उनके दिमाग में केवल एक ही चीज है – भारत का संविधान.’’
प्रशासन की ओर से देरी कोर्ट की अवमानना होगी सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस बहुत गंभीर विषय पर कार्रवाई करने में प्रशासन की ओर से देरी को अदालत की अवमानना माना जाएगा. सर्वोच्च अदालत का यह आदेश पत्रकार शाहीन अब्दुल्ला की याचिका पर आया है जिन्होंने शुरू में पहले दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को नफरत फैलाने वाले भाषण देने वालों के खिलाफ मामले दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था. अब्दुल्ला ने शीर्ष अदालत के 21 अक्टूबर, 2022 के आदेश को सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में लागू करने का अनुरोध करने के लिए पुन: याचिका दाखिल की.









