नईदिल्ली (ए)। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को याचिका दायर करने वाले एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) से जानना चाहा कि राज्यों की विधायिका को केंद्रीय कानून पर राय रखने का अधिकार है या नहीं। न्यायालय ने इसके साथ ही एनजीओ को इस विषय पर और अधिक शोध करने को कहा। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और तीन कृषि कानून जैसे केंद्रीय कानूनों के खिलाफ विभिन्न राज्यों की विधायिका के प्रस्ताव पारित करने के अधिकार को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये कानून संविधान की सातवीं अनुसूची में उल्लिखित संघीय सूची के तहत आते हैं।
एनजीओ ने केंद्र और पंजाब, राजस्थान, केरल और पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर को याचिका में पक्षकार बनाते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही संसद द्वारा पारित इन कानूनों के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर विचार कर रही है।
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमणियन की पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई चार हफ्ते के लिए स्थगित करते हुए टिप्पणी की, ‘हम समस्या सुलझाने के बजाय और समस्या खड़ी नहीं करना चाहते हैं, हम इसे देखेंगे।’
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एनजीओ ‘समता आंदोलन समिति’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौम्या चक्रवर्ती ने कहा कि राज्य विधानसभाएं केंद्रीय कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने में सक्षम नहीं हैं। इस पर पीठ ने उन प्रस्तावों को दिखाने को कहा, जिनपर उन्हें आपत्ति है। इसपर चक्रवर्ती ने केरल विधानसभा द्वारा सीएए के खिलाफ पारित प्रस्ताव का संदर्भ दिया है और कहा कि यह अमान्य है।















