यह फैसला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिया। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से न सिर्फ सजा बल्कि एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को भी समाप्त कर दिया…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में सुनवाई के दौरान अपने ही शब्दों में कही गई ‘सिक्स सेंस’ के आधार पर एक असाधारण रास्ता अपनाते हुए 10 साल की सजा काट रहे दोषी व्यक्ति की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने माना कि मामला सहमति से बने रिश्ते का था, जिसे गलतफहमी के चलते आपराधिक रंग दे दिया गया। अदालत के हस्तक्षेप के बाद पीड़िता और आरोपी का विवाह हुआ और अब दोनों साथ सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं।
यह फैसला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिया। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से न सिर्फ सजा बल्कि एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को भी समाप्त कर दिया।
मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दोषी व्यक्ति की सजा निलंबित करने (बेल) की याचिका खारिज कर दी। दोषी व्यक्ति ने इसके खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया। मार्च में नोटिस जारी होने के बाद करीब नौ महीने तक इस मामले की निगरानी हुई। इस बीच, अदालत ने एक असामान्य कदम उठाते हुए आरोपी और पीड़िता, दोनों को उनके माता-पिता के साथ अदालत में पेश होने को कहा।
दोषी व्यक्ति उस समय जेल में था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि उसे पुलिस सुरक्षा में अदालत में पेश किया जाए। इसके बाद न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों और उनके परिजनों से चेंबर में व्यक्तिगत रूप से बातचीत की, ताकि उनके रिश्ते की वास्तविक प्रकृति को समझा जा सके।
अपने आदेश में पीठ ने कहा- यह उन दुर्लभ मामलों में से एक है, जहां इस अदालत के हस्तक्षेप से अपीलकर्ता को अंततः लाभ हुआ। जब यह मामला उच्च न्यायालय द्वारा सजा निलंबन याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ हमारे समक्ष आया, तो तथ्यों पर विचार करते हुए हमें एक छठी इंद्रिय (सिक्स सेंस) ने संकेत दिया कि अपीलकर्ता और अभियोजिका को एक साथ लाया जा सकता है।
पीठ ने बताया कि बातचीत के दौरान दोनों ने विवाह करने की इच्छा जताई, जिसे उनके माता-पिता ने भी स्वीकृति दी। इसके बाद अदालत ने आरोपी को शादी के लिए जमानत दी।
जुलाई में दोनों का विवाह हो गया। इसके बाद अदालत ने मामले को दिसंबर तक के लिए स्थगित रखा, ताकि उनके वैवाहिक जीवन की स्थिति का जायजा लिया जा सके। अदालत को यह जानकारी दी गई कि दोनों पति-पत्नी के रूप में खुशहाल जीवन जी रहे हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम आदेश पारित करते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द कर दिया।
अपने फैसले में अदालत ने कहा- गलतफहमी के कारण दोनों के बीच सहमति से बने रिश्ते को आपराधिक रूप दे दिया गया और झूठे विवाह-प्रलोभन के आरोप में बदल दिया गया। जबकि वास्तव में दोनों का विवाह करने का इरादा था। केवल विवाह की तारीख टलने से अभियोजिका के मन में असुरक्षा उत्पन्न हुई और आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई।
मामला क्या था
दोनों की दोस्ती 2015 में सोशल मीडिया के जरिए हुई थी। इसके बाद दोनों में करीबी बढ़ी और सहमति से शारीरिक संबंध भी बने। विवाह न हो पाने पर वर्ष 2021 में महिला ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 376(2)(n) (बलात्कार) के तहत एफआईआर दर्ज कराई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो अब भी लंबित है। हाईकोर्ट से राहत न मिलने पर वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को एक और बड़ी राहत देते हुए निर्देश दिया कि मध्य प्रदेश के सागर स्थित सरकारी अस्पताल में उसकी नौकरी बहाल की जाए। दोषसिद्धि के बाद उसे निलंबित कर दिया गया था। अदालत ने निलंबन समाप्त कर बकाया वेतन (एरियर) का भुगतान करने का भी आदेश दिया।
















