एक छोटी सी बच्ची जिसने बचपन से अपने आस पास लोगो को दर्द में देखा, तकलीफ में देखा, बहुत छोटी उम्र में ही पिता का साया सिर से हट गया। एक दुर्घटना में पिता ईश्वर के पास और परिवार से दूर चले गए और बहुत छोटी उम्र ही अपनी छोटी बहन के लिए माँ बन गयी साथ ही अपनी माँ की जिमेदारी में हाथ बटाना शरू कर दिया। जहाँ मा घर के बाहर पिता की जिम्मेदारी निभा रही थी तो खुद मा की तरह घर की जिम्मेदारी निभा रही थी। वक्त बीत गया फिर छोटी सी उम्र सिर्फ 18 साल की उम्र में एक पवित्र रिश्ते में बंध गई और शादी हो कर दूसरे घर पहुच गई। तब जिदगीं को बेहद नजदीक से देखना शरू किया समाज के बुराइयां उसके साथ जूझ रहे लोगो का गहरा दर्द देख कर आखों से जब आंसू आने लगे तब जीवन का एक फैसला लिया कि मैं खुद समाज के लिए काम करुँगी। इस सोच और दर्द को लिए जिदगीं फाउडेशन को जन्म दिया। इस वक्त की शुरुआत मातृ छाया संस्था के साथ मिलकर शरू किया। बेसहारा, अनाथ, झुगी-झोपड़ी के बच्चो के लिए काम करना शरू किया, फिर मूक बधिर बच्चो को पढ़ना, उन्हें निशुल्क स्पीच थेरैपी देना, सखी सेंटर के साथ मिलकर उन बच्चो की सहायता करने का व उंनके हित और न्याय के लिए खड़े हो कर आवाज उठाना शरू किया। धीरे-धीरे जिंदगी और सोच ने अपने पंख लगाए और किन्नर समुदाय के लोगो के लिए भी काम करना शरू किया। उनके रोजगार के लिए साधन जुटाना, वर्कशॉप करना उनके लिए लोगो का नजरिया बदलने के लिए कार्यक्रम करना। उन्हें अपने स्तर पर सहयोग करना। ये सारी उचित व बेहतरीन प्रयासों को अपनी हिम्मत से अंजाम दिया। इन सब मे उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा पर कहते हैं ना कि जहाँ चाह होती है वहाँ राह होती है। मुश्किल होता था घर परिवार और जॉब और समाजिक दायित्व को एक साथ समय देना, पर खुद को पूरे समय भागती रही। ना दिन देखा ना रात बस दिल से अपने काम को करती रही। इन सभी चीजो में परिवार का बेहद साथ रहा। जिसकी वजह से जीवन का बड़ा फैसला लिया कि खुद के बच्चे को तब जन्म देंगी जब उनके उन बच्चो को सहारा व घर मिल जाये जिनके लिए वो काम करती हैं। आज ईश्वर की कृपा है कि उनमें से बहुत अनाथ बच्चों को उनका घर मिल गया है, पर अब भी कुछ गिनती के बच्चे बचें है साथ ही खुद प्यारी ख़ुशी भी। आज जिदगीं फाउडेशन छतीसगढ़ की ऐसी पहली ऐसी संस्था है जो कभी किसी से पैसे नही लेती और ना देती हैं वो जो भी करती है अपने जॉब अपने काम से मिले पैसे को अपनी संस्था में लगाती हैं और जरूरत मंद लोगो की सहायता करती है। यशा एक बेहतरीन कोरियोग्राफर है। एक शानदार टीचर है जो मुक़ बधिर बच्चों को पढ़ाती है। इसके साथ ही गर्मी में महिलाओं को जुबा व डांस के माध्यम से स्वस्थ फिट होने का क्लास देती है। आज उनकी पहचान केवल छतीसगढ़ में नही बल्कि हर राज्य में है। बहुत सारे राज्य स्तर के अवार्ड से सम्मानित होने के साथ नेशनल अवार्ड भी हासिल किया है। समाजसेविका के रूप में उन्हें दर्पण कहना इस लिए सही है क्योकि जहां आज लोगो ने समाज सेवा के नाम को केवल बदनाम किया है। जहाँ लोग समाजसेवा केवल अपने हित व पैसे बनाने का अचूक साधन बना लिया है और कुछ छोटे छोटे काम कर फोटोशूट कर लोगो को उल्लू बनाने का धंधा चल रहा है। वहाँ पर यशा पूरी ईमानदारी व निष्ठा से अपने विचारों को रखा व अपने काम को पूरा किया। उन्होंने अपने हित के लिए नही अपितु समाज के हित के लिए काम किया। एक बहुत अच्छी बिजनेस वुमन व समाजसेविका का किरदार बेहद संजीदा हो कर दिल से जिया। इसलिए आज उनकी भी गिनती उन सभी अच्छे संस्थावो के साथ लिया जाता है जो सही मायने में समाजसेवा कर रहे हैं और लोगों का सहयोग वास्तिवक रूप से कर रहे हैं। जिदगीं फाउंडेशन केवल एक संस्था नही है और ना ही एक नाम है बल्कि उसे अपने बच्चे की तरह अपनी आत्मा की तरह यशा ने उन्हें बडा किया है।
छोटे छोटे लम्हे मेरे,साथ लगे हुए हैं।
ख्वाबों का घरोदा बनाने में वक्त लगता है।।









