भाषा की टूटती मर्यादा….कितनी सही, कितनी गलत?
भाषा में मर्यादा की अब कोई सीमारेखा नहीं रह गई है। आम बोलचाल से लेकर सोशल मीडिया, यहाँ तक कि फिल्में इससे अछूती नहीं रहीं हैं। साहित्य में भी चलाऊ शब्दों का प्रयोग, उनकी घुसपैठ हमारे समाज को किस ओर ले जा रही है? वयस्कों के साथ ही साथ किशोरों में भी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। आजकल तो बच्चों की ज़ुबान पर भी ऐसे शब्दों का कब्जा है।
ऐसा माना जाता है कि गुस्से में ज़ुबान से अपशब्द निकल जाते हैं। पुरुषों के लिए यह असामान्य नहीं रहा। कई बार अपनी धौंस जमाने के लिए पुरुष भद्दे शब्दों का प्रयोग करते थे। इतिहास पर नज़र डालें, तो गुस्सा, द्वेष पहले भी था, लेकिन तब भाषा मर्यादित थी। अब भद्दे शब्द गुस्से की प्रतिक्रिया के साथ ही साथ एक चलन के रूप में भी स्वीकार्य होने लगे हैं। अक्सर ऐसा देखा जाने लगा है कि सामान्य भाषा का प्रयोग करने वालों की ओर कोई ध्यान नहीं देता जबकि कुछ अलग हटकर प्रयोग किए गए शब्द अनायास ही लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं।
जिन शब्दों का प्रयोग अपनी माँ, बहन, बेटी के सामने उचित नहीं है, उन शब्दों को कैसे और क्यों दोस्तों के बीच में धड़ल्ले से प्रयोग किया जाने लगा? अंग्रेज़ी के बेहूदे शब्द भी टिप्पणी के रूप में अब स्वीकार्य हैं। अब इन शब्दों के प्रयोग में लड़के और लड़कियों में कोई खास अंतर नहीं रह गया है। आखिर क्यों? ये आधुनिकता तो हरगिज़ नहीं है। फिर हमारा समाज ऐसा क्यों हो गया है? साहित्य और फिल्मों का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आज इस चलताऊपन के कारण जो प्रसिद्धि और प्रचार मिल रहा है, क्या ये उसी का परिणाम नहीं है? मर्यादित भाषा में क्या अपनी बातें अभिव्यक्त नहीं की जा सकतीं?
अगर लोग इसे समाज और पीढ़ी में हो रहे एक सामान्य बदलाव की तरह देख रहे हैं, तो यह बड़ी भूल है। अमर्यादित भाषा के प्रयोग से व्यक्ति धीरे-धीरे हिंसा की ओर जाने लगता है। समाजशास्त्र कहता है कि भाषा का पतन दरअसल संस्कारों का पतन है। जब व्यक्ति को अपनी अमर्यादित भाषा का भी कोई असर होता नहीं दिखाई देता है, तो फिर वह हिंसा करने से भी पीछे नहीं हटता क्योंकि ज़बानी हमला करना तो उसकी आदत बन चुकी होती है।
अब आखिर इसका समाधान क्या है? वैसे तो इसका जवाब परवरिश में छुपा है। तीन स्तरों पर सावधानी रखने की विशेष आवश्यकता है- घर, पड़ोस और स्कूल। बच्चे का समाजीकरण इन्हीं तीन स्तरों पर होता है। घर में सही भाषा का प्रयोग हो। बच्चे अपने बड़ों का ही अनुसरण करते हैं। आस-पड़ोस, स्कूल-कॉलेज में दोस्त बहुत प्रभावित करते हैं। जब बच्चा गलत शब्दों का प्रयोग करे, तो इन बातों का ध्यान रखें- जब वह पहली बार कोई गलत शब्द का प्रयोग करता है, तो नज़रंदाज़ करें। डाँटे, हँसे या मुँह न बनाएँ। बच्चा यही प्रतिक्रिया चाहता है। दूसरी-तीसरी बार में बिना धमकाए, बिना किसी नतीज़े का डर दिखाए, उसे अपने विश्वास में लेते हुए समझाएँ कि गलत भाषा का प्रयोग करना सही नहीं है, ऐसे बच्चे लोकप्रिय नहीं हो पाते। ज़रूरी नहीं है कि एक बार में ही बच्चा समझ जाए, उसे प्यार से समझाते रहें, असर अवश्य दिखेगा। सबसे ज़रूरी बात है कि स्वयं साफ-सुथरी व मर्यादित भाषा का प्रयोग करें।
–आभा बघेल
रायपुर, छत्तीसगढ़
(लेखिका एक शिक्षिका होने के साथ ही साथ मनोवैज्ञानिक सलाहकार व समाजसेवी भी हैं)









