नईदिल्ली (ए)। उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को राहत देते हुए जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। न्यायालय ने पीड़िता के शरीर पर आरोपी के नाम का टैटू, मुकदमा दर्ज कराने में देरी को प्रमुख आधार मानते हुए यह आदेश दिया है। न्यायालय ने कहा है कि पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने सितंबर, 2016 से मई, 2019 तक जबरन शारीरिक संबंधन बनाता रहा, लेकिन उसने इस बारे में न सिर्फ 3 साल तक चुप्पी साधे रही बल्कि अपने पति को भी नहीं बताई।
जस्टिस रजनीश भटनागर ने आरोपी संजय को 25 हजार रुपये के निजी मुचलका और इतनी ही रकम की जमानत जमा करने की शर्त पर जेल से रिहा करने का आदेश दिया है। उन्होंने आरोपी के उन दलीलों को स्वीकार कर लिया जिसमें उसने कहा कि वह पीड़िता से प्रेम करते हैं और दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने। आरोपी ने अपने बचाव में न्यायालय को बताया कि पीड़िता ने अपना प्यार दर्शाने के लिए अपने हाथ पर उसके नाम का टैटू बनाया और इसकी तस्वीर भी उन्हें ई-मेल के जरिए भेजा। इसके साथ ही कहा था कि पीड़िता ने बाद में उसे फंसाने के लिए दुष्कर्म का झूठा मामला दर्ज कराया। हालांकि पीड़िता ने न्यायालय को बताया कि आरोपी ने जबरन उसके शरीर पर अपने नाम का टैटू बनाया और उसकी अश्लील तस्वीर दिखाकर काफी लंबे समय से दुष्कर्म करता रहा।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि तथ्यों से साफ है कि इस तरह का टैटू प्रशिक्षित आर्टिस्ट के जरिए विशेष उपकरण के इस्तेमाल से ही बनाया जा सकता है। साथ ही कहा कि जब वह (पीड़िता) विरोध करती तो इस तरह का टैटू बनाना संभव नहीं होगा। इसके अलावा न्यायालय ने कहा है कि गिरफ्तारी समय पुलिस ने आरोपी का मोबाइल फोन जब्त किया था, लेकिन पुलिस की रिपोर्ट यह साफ है कि उसमें पीड़िता की या किसी की न्यूड तस्वीरें नहीं थी। न्यायालय ने कहा है कि पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार आरोपी द्वारा पीड़िता को धमकी देने का कोई साक्ष्य नहीं है। पीड़ित महिला की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने पिछले साल संजय के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार किया था। हालांकि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि उनके किसी टिप्पणी का मामले के तथ्यों और आगे की सुनवाई पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।














