रायपुर (सारनाथ एक्सप्रेस)। आईएएस बनने का सपना सभी स्टूडेंट देखते हैं लेकिन तैयारी के बावजूद इस परीक्षा में चंद स्टूडेंट ही सफल हो पाते हैं। ऐसे ही एक सफल आईएएस डॉ. गौरव कुमार सिंह जो कि वर्तमान में जिला पंचायत रायपुर के सीईओ के पद पर पदस्थ हैं। इन्होंने अपने अब तक के सफर को साझा करते हुए सारनाथ एक्सप्रेस से विशेष बातचीत की।
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के गौसगंज गांव में पले-बढ़े आईएएस डॉ. गौरव कुमार सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल में पूरी हुई। इनके पिताश्री शिवराज सिंह शासकीय पीबीआर इंटर कालेज के प्रधान अध्यापक थे। सन् 1987 में इनके क्षेत्र में पहला सरस्वती शिशु स्कूल की शुरुआत इनके पिताजी की पहल पर हुई। जिसमें डा. गौरव कुमार सिंह प्रथम स्टूडेंट रहे। हायर सेकेण्डरी की शिक्षा इन्होंने गौसगंज के इंटर मीडिएट स्कूल से पूरी की। कानपुर से इंजीनियरिंग की तैयारी के पश्चात इंजीनियरिंग में इनका सलेक्शन केएनआईटी गर्वमेंट कालेज सुल्तानपुर में हुुआ। वर्ष 2002 से 2006 तक इंजीनियरिंग करने के पश्चात इनको चार एमएनसी कंपनियों में जॉब के आफर आए लेकिन इन्होंने नौकरियो का ऑफर छोड़कर गेट की परीक्षाओं की तैयारी में जुट गए। गेट की परीक्षा में इन्होंने 99.37 परसेंटाईल प्राप्त कर आईआईटी दिल्ली में एमटेक (एनर्जी स्टडी) में दाखिला हुआ। एमटेक के प्रथम सेमेस्टर में टॉप करने पर जर्मनी सरकार द्वारा फिलोशिप के लिए इन्हें चयनित किया। जिसमें इन्हें जर्मनी जाकर एक वर्ष तक प्रोजेक्ट बनाने का सुनहरा मौका मिला लेकिन इन्होंने जर्मनी ना जाकर सिविल सर्विसेस एग्जाम की तैयारियों में फोकस किया। वर्ष 2008 में एमटेक पूर्ण करने के पश्चात कई मल्टी नेशनल कंपनियों से जॉब के ऑफर आए। इन्होंने नौकरी ना कर पीएचडी (सोलर एनर्जी के लिए एनालिसिस ऑफ इनवायरमेनटल इम्पेक्ट ऑन दी परफार्मेस पीजी माड्यूल विषय पर) के साथ-साथ सिविल सर्विसेस की तैयारी जारी रखी। वर्ष 2010 में सिविल सर्विसेस एग्जाम में प्री और मेंस क्लियर करने के बावजूद इंटरव्यू में क्वालिफाई नहीं कर पाए। यही स्थिति वर्ष 2011 के एग्जाम में भी रही। इन दोनों वर्ष की परीक्षाओं में इनके ऑप्शनल भूगोल और लोक प्रशासन रहे। वर्ष 2013 में सिविल सर्विसेस एग्जाम में इन्होंने अपने आप्शनल सब्जेक्ट चेंज कर हिंदी साहित्य और लोक प्रशासन किया और इस वर्ष इन्हें सफलता मिली। वर्ष 2013 के एग्जाम में इन्होंने देशभर में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किए जो कि आज तक रिकार्ड है। स्कूल समय से ही वाद-विवाद, भाषण, निबंध आदि में अव्वल रहते हुए इन्हें कई बार पुरस्कृत किया जा चुका है। वर्ष 2013 में चयन होने और मसूरी एकेडमी में ट्रेनिंग पश्चात इनकी पहली पोस्टिंग अस्सिटेंट कलेक्टर रायगढ़ के लिए हुआ। वर्ष 2015 में इन्हें नई दिल्ली में भारत सरकार के खेल एवं युवा कल्याण मंत्रालय में सहायक सचिव की भी अहम जिम्मेदारी दी गई जहां इन्होंने तीन माह तक अपनी सेवाएं दी। नवंबर 2015 में इनकी पोस्टिंग एसडीएम सरायपाली के लिए हुआ जहां इन्होंने एक वर्ष तक अपनी सेवाएं दी। नवंबर 2016 में इनकी पोस्टिंग जिला पंचायत सीईओ दंतेवाड़ा के लिए हुआ। दंतेवाड़ा में इन्होंने नक्सल प्रभावित गांव को कैशलेश करने में अहम योगदान दिया। जिसके लिए दंतेवाड़ा जिले को प्रधानमंत्री द्वारा पुरस्कृत किया गया। प्रौढ़ शिक्षा के तहत पूरा जेल को साक्षर करने के लिए इन्होंने अहम भूमिका निभाई। जिसके लिए उप राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय साक्षरता अवार्ड से सम्मानित किया गया। छोटे बच्चों के लिए चलाई गई योजना “पढ़े दंतेवाड़ा-लिखे दंतेवाड़ा” के सफल आयोजन के लिए नेशनल ई-गर्वमेंट अवार्ड से पुरस्कृत किया जा चुका है। दंतेश्वरी ई-रिक्शा जिसमें राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री ने सफर किया था। इसकी शुरुआत में इनका अहम योगदान रहा। कड़कनाथ मुर्गा के उत्पादन को बढ़ाने, उसकी आय सुनिश्चित करने का काम भी इनके सहयोग से किया गया। उस क्षेत्र में युवा बीपीओ शुरु करने, महिला सशक्तिकरण आदि में इन्होंने अपनी अहम भूमिका अदा की। दिसंबर 2017 में इनका स्थानांतरण जिला पंचायत सीईओ धमतरी के लिए हुआ। जहां पदस्थ रहते हुए भी इन्होंने केन्द्र सरकार व राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने और उन योजनाओं का लाभ दिलाने में योगदान दिया। अप्रैल 2018 में दुर्ग जिला पंचायत सीईओ के पद पर इनका तबादला हुआ। जहां इन्होंने एक वर्ष तक अपनी सेवाएं दीं। वर्तमान में यह जिला पंचायत सीईओ रायपुर के पद पर पदस्थ हैं।
तीन भाईयों में सबसे छोटे आईएएस डॉ. गौरव कुमार सिंह ने बताया कि इनके पिता एक शिक्षक हैं और जिस कालेज में प्रिंसिपल रहे उस कालेज और उस क्षेत्र से हर वर्ष आईएएस निकलते थे फिर वो जब अधिकारी बनकर गांव जाते तो पिताजी का आशीर्वाद लेते तो यह सब देखकर हम भाईयोंं ने भी तय किया कि आईएएस बनना है और पिताजी की भी इच्छा थी कि हम भाईयों में से कोई आईएएस बने। हम तीनों ने पीएचडी किए और गोल्ड मेडलिस्ट रहे। वर्ष 2004 में पिताजी की तबियत खराब होने की वजह से घर की पूरी जिम्मेदारी बड़े भाई के ऊपर आ गई। जिसके कारण उन्होंने बैंक की नौकरी कर ली। मेरे आईएएस बनने का उद्देश्य यही है कि मेरी जो क्षमताएं हैं वो अधिक से अधिक राष्ट्रहित में लगा सकूं। जितने के लिए कठोर परिश्रम, सकारात्मक सोच और सीखने की चाह बहुत जरुरी है।









