दीप पर्व मनाने के लिए प्रयागराज अब तैयार हो चुका है। पांच दिनी दीप पर्व की शुरुआत 22 अक्तूबर शनिवार धनतेरस से होगी। तमाम लोग शनिवार को लौह धातु से बनी चीजें जैसे बर्तन, वाहन आदि खरीदने से गुरेज करते हैं और धनतेरस के दिन शायद ही कोई हिन्दू परिवार हो, जहां इन चीजों की खरीदारी न करता हो। शनिवार के दिन धनतेरस होने से तमाम लोगों के मन में संशय आ गया है। अगर आपके मन में भी शनिवार और धनतेरस को लेकर कोई संशय है तो परेशान न हों। शनिवार को बर्तन की खरीदारी से बचना चाह रहे हैं तो रविवार को खरीदारी के लिए पूरे दिन का अवसर मिलेगा।
दीपावली का उत्सव दीपों के कारण रात को मनाया जाता है। शनिवार को शाम 436 बजे तेरस लग रहा है। इसलिए खरीदारी का शुभ मुहूर्त शनिवार से शुरू हो रहा है, लेकिन रविवार को भी शाम 504 बजे तक तेरस है, ऐसे में लोग रविवार को पूरे दिन खरीदारी कर सकते हैं। उत्थान ज्योतिष संस्थान के निदेशक पं.दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली का कहना है कि धनवंतरी जयंती सहित प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी तिथि में धनतेरस पर्व 22 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन गृहोपयोगी सामान खरीदने की प्राचीन परंपरा है। इस साल त्रयोदशी तिथि का मान 22 अक्टूबर को शाम में 4:33 बजे से 23 अक्टूबर को शाम 5:04 बजे तक है। अत गृहोपयोगी सामान त्रयोदशी तिथि के स्थिर लग्न में खरीदना श्रेयस्कर होता है। इस दिन 22 अक्तूबर को त्रयोदशी तिथि के शुरुआत दोपहर 1:30 बजे के बाद से 23 अक्टूबर को दिन में 2:38 बजे तक उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, इंद्र योग शाम 5:05 तक व मित्र योगा व्याप्त रहेगी।
धनतेरस 23 अक्टूबर कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जा रहा है। इस दिन हनुमान जयंती, शनि प्रदोष व्रत है, इस दिन शनि मार्गी हो रहे हैं। धनतेरस पर ये संयोग बहुत ही अलग है। धनतेरस और शनि प्रदोष व्रत का संयोग 27 साल बाद पड़ रहा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन चिकित्सा जगत के गुरु देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत का कलश लेकर के हाथ में प्रकट हुए थे। इनके साथ साथ ही लक्ष्मी इंद्र और कुबेर भी इसी दिन प्रकट हुए थे।
इस संयोग के कारण इस बार धनतेरस का पर्व बहुत खास रहेगा। शनि के मार्गी और शनि प्रदोष होने के कारण शनि की साढ़े साती और ढ़ैया वालों के लिए भी धनतरेस बहुत ही शुभ है। इस बार धनतरेस पर एक साथ ऐसे संयोग का पड़ना बहुत खास है, जो विभिन्न राशियों के लिए भी फायदेमंद है। इसके साथ ही धनतरेस पर सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग पर्व है। इस प्रकार धनतरेस पर पूजा कर महालक्ष्मी की कृपा मिलेगी। धनरेसपर पर पूजा का शुभ मुहूर्त सायंकाल 5:40 से 8:50 के बीच का रहेगा।
दीपावली की खरीदारी के लिए इस वक्त हर घर में विशेष तैयारियां चल रही हैं। धनतेरस पर जिसका, जैसा सामर्थ्य होता है लोग उसके हिसाब से खरीदारी करते हैं। कोई सोने-चांदी के आभूषण खरीदता है तो कोई कार-बाइक, कोई इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण खरीदता है तो कोई एक थाली खरीदकर ही पर्व मना लेता है। पिछले कुछ वर्षों में धनतेरस पर झाडू खरीदने का प्रचलन तेजी से बढ़ा है, वहीं बहुत से लोग छिपे तौर पर कछुआ और उल्लू के पंजे खरीदते हैं। वास्तव में धनतेरस पर किन वस्तुओं को खरीदने का पौराणिक महत्व है और किन चीजों को सुनी-सुनाई बातों पर खरीदा जा रहा है, इसे लेकर जानकार अपनी राय रखते हैं।
गणेश-लक्ष्मी की पूजा आवश्यक दीपावली के अवसर पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा का विधान पुराणों में है। ऐसे में यही पूजा सर्वाधिक करनी चाहिए। सामान्य मिट्टी के पात्र खरीद सकते हैं। चिकनी मिट्टी के पात्र नहीं।
सफाई जरूरी
धनतेरह पर झाड़ू का भी विशेष महत्व है। उत्थान ज्योतिष संस्थान के निदेशक पं. दिवाकर त्रिपाठी ‘पूर्वांचली’ का कहना है कि झाड़ू नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करती है। घर में सफाई होगी तो सकारात्मक सोच विकसित होगी। जो लक्ष्मी के प्रवेश का द्वार है। ऐसे में झाड़ू और कलश सर्वाधिक उपयोगी तथा पौराणिक मान्यता के अनुसार है।
उल्लू का पंजा खरीदना महत्वहीन: कछुआ और उल्लू के पंजे खरीदना पूरी तरह से सुनी सुनाई बाते हैं। कहा कि कछुआ देखना शुभ है। यह संवृद्धि का प्रतीक है लेकिन दीपावली से इसे जोड़ने का कहीं कोई पौराणिक महत्व नहीं है। भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लिया था। ऐसे में कछुआ घर में रखने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होंगी, यह सही है लेकिन दीपावली के दिन इसे खरीदने का कोई मतलब नहीं है। वहीं, उल्लू के पंजे की पूजा का भी उल्लेख कहीं नहीं है। उन्होंने तर्क देकर कहा कि भगवान शिव की पूजा होती है। मंदिर में भगवान शिव के साथ नंदी की पूजा करते हैं, लेकिन अकेले नंदी की पूजा कहां पर होती है।
बर्तन की खरीदारी धनतेरस पर सबसे ज्यादा खरीदारी बर्तन की होती है। कोई बाल्टी खरीदता है तो कोई थाली, कोई कढ़ाई तो कोई डिनर सेट खरीदता है। त्योहार पर घर में कुछ नया आना अच्छी बात है, लेकिन सबसे अच्छा माना जाता है कलश। ज्योर्तिविदों का कहना है कि भगवान धनवंतरी कलश लेकर अवतरित हुए थे। माता लक्ष्मी भी जब समुद्र से निकलीं तो उनके हाथ में कलश था। ऐसे में पात्रों की खरीदारी में सबसे शुभ कलश ही है। कलश खरीदकर इसमें जल भरकर दीपावली के दिन पूजा करने से माता लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है।
साभार: हिंदुस्तान
















