

छत्तीसगढ़- अपरिमित सौंदर्य…..
“टाऊ जानते हो, क्या होता है?”
नहीं?
सरगुजा ज़िले के मैनपाट के पठार पे गए होते अगर, तो पता होता कि क्या होता है टाऊ। मैनपाट, नामानुसार, एक पठार, ऊँचाई पे लगभग समतल मैदान जैसा है। वास्तव में भूवैज्ञानिक दृष्टि से, पठार से ज़्यादा इसे “टेबल टॉप” या “मेसा भूसंरचना(MESA)” कहना ज़्यादा उपयुक्त होगा, यानी आसपास की ज़मीन में से अचानक से तीव्र ढलान के साथ जैसे एक ज़मीन मेज़ की तरह सीधी ऊपर खड़ी हो गई हो। ज़िला मुख्यालय अम्बिकापुर से पैंतालीस किलोमीटर दूर, इस मैनपाट पठार की सामान्य ऊँचाई औसत समुद्र सतह से 1080 मीटर है, जबकि अधिकतम ऊँचाई “परपटिया घाट” पे 1165 मी. तक पहुँच जाती है। एक किलोमीटर से अधिक ऊँचाई पे होने के कारण यहाँ का मौसम आम तौर पे सुहावना रहता है, पर ऑगस्ट से लेकर मार्च तक ये बहुत हसीन रहता है, सुंदर, सर्द, और मदमस्त हवा वाला मौसम।


जब सामान्य मौसम वाली जगह का बंदा मैनपाट की आकर्षक ठंड महसूस करता है ना, तो अपने तन को ही नहीं बल्कि अपने मन को भी भीड़ भाड़ और भौतिकता के गर्त से बहुत ऊपर पाता है। सुबह सुबह चहलक़दमी करो तो लगता है कि धुली हुई सफ़ेद धुंध की चिकनी मखमली चादर के पर्दे को तनी उंगलियों से छूकर, हटाते हुए, पर्दों के पार और अधिक सुन्दर दुनिया या देवलोक ही जा रहें हों। शायद स्वर्ग में भी इससे बेहतर अनुभव ना हो, आत्मा तृप्त हो जाती है। दिन में धूप लगेगी, मगर सूरज के छिपने से लगता है कि दूर जल रही आग पे बर्फ़ की चादर चढ़ गई हो। 2-4 डिग्री का न्यूनतम तापमान रेयर नहीं है यहाँ।
ओह, मैं तुम्हें टाऊ की बात तो बताना भूल ही गया! ख़ैर, इसकी बात बिना मौसम की जानकारी के अर्थहीन भी थी, और बिना समाजशास्त्र के संदर्भ-विहीन। तो समाजशास्त्र की बात ये है कि भारत- चीन के 1962 के युद्ध के बाद, 1963 में सरकार ने तिब्बत के निर्वासितों को मैनपाट में भी पनाह दी, क़रीब 1200 तिब्बती बुद्धिस्ट ने मैनपाट को अपना घर बना लिया, क्यूँकि यहाँ की जलवायु उनके अनुकूल थी। यहाँ उन्होंने अपनी monastery (मठ) बना ली, जो धार्मिक, आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण होने के अतिरिक्त, तिब्बतीय वास्तुकला का ख़ूबसूरत नमूना है। मैनपाट के दर्जनों दर्शनीय स्थलों में से एक। छत्तीसगढ़ जैसे केंद्रीय भारत के किसी स्थान पे, अगर आप एक विदेशी, परंतु आध्यात्मिक रूप से लगभग भारतीय, किसी अन्य संस्कृति को देख पाते हैं तो बड़ा समृद्धिकारक अनुभव होता है। मानववैज्ञानिक भाषा में कहें तो प्रतिनिधि भारतीयता के मनमोहक रोमांचकारी, एकात्म-वैविध्य वाले रंगीन महासागर के मध्य अलग सा दिखने वाला तिब्बती मंगोल-वर्ण का शांत द्वीप, मैनपाट को और रुचिकर बना देता है। तो, इन्हीं तिब्बतियों ने स्थानीय यादव लोगों को टाऊ के बारे में बताया और उन्हें टाऊ की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया।

दरअसल चीन के युन्नान प्रांत में जन्मे टाऊ फसल को ( जिसे वस्तुतः BUCKWHEAT, या BEECH WHEAT भी, कहते हैं), तिब्बत के ठंडे जगहों पे मूल भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं, क्यूँकि यहाँ पे शीत काल में गेहूँ की खेती लायक़ मौसम ज़्यादा देर तक नहीं रहता, और टाऊ महज़ 10-12 हफ़्ते में तैयार हो जाता है। तिब्बत में इसके तिकोने काले बीज को, खोल निकाल कर, पीस कर आटा बनाकर, पानी मिलाकर नूडल बना लेते हैं। भारत में, ये व्रत में खाया जाने वाला मुख्य पदार्थ है क्यूँकि हिंदू परम्परा में व्रत के दौरान अनाज खाने की मनाही है, अतः इसे “कूट्टू के आटे” के रूप में पकोड़े या पूरी बना कर खाया जाता है। तिब्बती इसकी चाय भी बनाते हैं। इसमें कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है परंतु इसमें प्रोटीन व खनिज भी बहुत होता है, साथ में बढ़िया डाइयटरी फ़ाइबर तो है ही।
नहीं भैया, मैं तुमको कृषि विज्ञानी नहीं सैलानी बनाना चाहता हूँ, तो टाऊ का ज़िक्र इसलिए किया क्यूँकि इसने ना सिर्फ़ मैनपाट के फसल चक्र को बदला बल्कि मैनपाट के भूदृश्य को भी बेइंतहा रोमांटिक कर दिया। ये पाट की ज़मीन ना, थोड़ी थोड़ी ऊपर नीचे होती है, इसलिए कहीं कहीं से आगे की भूमि दसियों किलो मीटर तक निर्बाध दिखाई देती है और अगर तुम नवेंबर या दिसम्बर के पहले हफ़्ते तक गए वहाँ, तो तुम्हें वो नज़ारा देखने को मिलेगा जैसे लगेगा कि तुम वैलीऑव फ़्लावर में हो। जहां तक नज़र जाएगी सिर्फ़ फूल ही फूल दिखेंगे, लगेगा आगे सफ़ेद गुलाबी फूलों की अंतहीन सेज बिछी है और तुम्हारी थकी आँखें उसपे लेट के चिर विश्राम में लीन हो गईं हों। अद्भुत अलौकिक दृश्य होता है, देखो ना वो फ़ोटो टाऊ के फूलों के सेज की। तुम्हारा मन करेगा कि मैनपाट की ज़मीन की इस सुंदरता की नायिका के साथ तुम अपने पसंद का दोगाना गाते हुए फूलों के बीच भँवरों की तरह उड़ते जाओ। जैसे पनाह देने के लिए, इस धरती के ऋण से उऋण होने के लिए, यहाँ की प्रकृति के ऋंगार के लिए ये उपहार लेके आए हैं वो बुद्ध के शिष्य। कितने कितने तरीक़ों से सजा लेती है प्रकृति अपने आप को!
क्रमशः……






