छठ का हठ साधारण हो,या विशेष हो,घना-घुप्प अंधियारा हो,या तनिक तम शेष हो,छोटा हो या बड़ा हो,है ज्योतिपुंज जब तक खड़ा,तमविजय है ही सुनिश्चित,ना कोई संशय लेश है।
जगमग जयकार है वह,तिमिर तिरस्कार है वह,विपदा विनाशक लक्षणों का,अर्किचन सरदार है वह,शगुन का सत्कार है वह,ना भी भले हो वो भास्कर,रवि का विस्तार है वह!
इसलिए ही माना जाए,दीप को ईंट का विलोम,और शब्दार्थ-शब्दकोष,बदल दिए जाएं ऊँ, ईट को मुगालता है कि,दीवार उसपे ही टिकी है,पर दीप तम को मारता है,और रोशनी दीपोन्मुखी है।
सौ छठ में अब हठ हो,शरीर योगी मठ हो,ना कि भोग भोटी रट हो,और दिमागों में भी दमभर,दीप ही जले,और शत्रु की भी मति पर,ईंट-पत्थर ना पड़े!!
सूरज सिंह परिहार – आईपीएस, छग






