सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेलें समाज की सुविधाओं का विस्तार नहीं हैं, बल्कि सुधार केंद्र हैं। कुछ नॉन-एसेंशियल या विलासिता की चीजें अगर न भी दी जाएं, तो जब तक उससे स्वास्थ्य या गरिमा को सीधा नुकसान नहीं होता, तब तक उसे मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जेल में बंद कैदियों, चाहे वे दिव्यांग हों या नहीं, को महंगा या पसंदीदा खाना न मिलना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सभी कैदियों को है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे व्यक्तिगत पसंद के लग्जरी खाने की मांग कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य की जिम्मेदारी यह है कि वह हर कैदी को पर्याप्त, पौष्टिक और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त भोजन दे। अगर कोई कैदी बीमार है या दिव्यांग है, तो उसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार खाना मिलना चाहिए, लेकिन पसंद का या महंगा खाना न मिलना कोई संवैधानिक अधिकार का हनन नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेलें समाज की सुविधाओं का विस्तार नहीं हैं, बल्कि सुधार केंद्र हैं। कुछ नॉन-एसेंशियल या विलासिता की चीजें अगर न भी दी जाएं, तो जब तक उससे स्वास्थ्य या गरिमा को सीधा नुकसान नहीं होता, तब तक उसे मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
















