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कल्याण सिंह का निधन: बाबूजी के रूप में मिली थी पहचान, अलीगढ़ के अतरौली से निकले और देश की राजनीति में छा गए थे, सिर्फ 35 की उम्र में बने थे MLA, 23 को होगा अंतिम संस्कार

लखनऊ (ए)। कल्‍याण सिंह के समर्थक उन्‍हें ‘बाबू जी’ के नाम से सम्‍बोधित करते थे। यह पदवी उन्‍हें उनके व्‍यवहार और नेतृत्‍व की अलग शैली ने दिलाई थी। अपने लोगों के लिए वह अभिभावक की तरह ही थे और हर वक्‍त तैयार खड़े रहते थे। इसी खूबी ने उन्‍हें अलीगढ़ के अतरौली से प्रदेश और देश की राजनीति में चमका दिया। राममंदिर आंदोलन और बाबरी ढांचा विध्‍वंस के दौरान एक वक्‍त आया जब समाचार माध्‍यमों के जरिए वह पूरी दुनिया में छा गए।

उनके राजनीति सफर की शुरुआत अतरौली से हुई थी लेकिन जल्‍द ही वह सियासत की दुनिया के धुरंधर बन गए। उन्‍होंने राजनीति के अखाड़े में बड़े-बड़ों को पटखनी दी और कई रिकार्ड तोड़ डाले। कल्‍याण सिंह का जन्‍म 5 जनवरी 1932 को अतरौली के मढ़ौली गांव में हुआ था। यहीं से वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक रहे ओमप्रकाश ने उन्हें राजनीति के क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रेरित किया। कल्‍याण 1967 में, अतरौली विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक चुने गए। लगातार 13 साल 1980 तक वह यहां से विधायक रहे। 1991 में यूपी सीएम के पद पर उनकी ताजपोशी हुई। 1997 में वह दोबारा मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1999 में उन्होंने भाजपा छोड़कर नई पार्टी (राष्ट्रीय क्रांति पार्टी) बना ली। कल्‍याण ने 2004 में फिर भाजपा में फिर वापसी की लेकिन बात बनी नहीं। 2009 में फिर मनमुटाव शुरू हो गया तो उन्‍होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया। इसके बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह से उनका याराना काफी चौंकाने वाला था। 2013 में एक बार फिर उनकी घर वापसी हुई। 2014 में उन्‍होंने जमकर भाजपा का प्रचार किया। केंद्र में नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही वह राजस्थान के राज्यपाल बना दिए गए।

दोस्‍तों के दोस्‍त, दुश्‍मनों के दुश्‍मन

कल्‍याण सिंह, राजनीति में दोस्‍तों के दोस्‍त और दुश्‍मनों के दुश्‍मन माने जाते थे। बात को दिल में दबाकर रखने में यकीन नहीं करते थे। एक बार राज्‍यपाल रहते हुए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की सार्वजनिक रूप से तारीफ कर वह घिर भी गए1 2019 के चुनाव से पहले सांसद सतीश कुमार गौतम के खिलाफ बोलने पर भी सवाल उठा। संवैधानिक पद पर होने के चलते कई राजनीतिक दलों ने उनके बयान का विरोध किया। मामला, राष्ट्रपति तक भी पहुंचा लेकिन कल्‍याण टस से मस नहीं हुए।

आरएसएस से हमेशा अच्‍छे रहे सम्‍बन्‍ध 

कल्‍याण सिंह का आरएसएस से हमेशा अच्‍छा रिश्‍ता रहा। भाजपा के पुराने नेताओं से भी उनकी खूब पटरी बैठती थी। उनके लिए लखनऊ राजनीति का केंद्र बिंदु रहा। वह जब भी लखनऊ में होते उनके यहां मिलने-जुलने वालों का तांता लगा रहता था। कल्‍याण सिंह से मिलना काफी आसान था। वह घर आए लोगों से दिल खोलकर बात करते थे। उनके नाती संदीप सिंह भी यूपी में मंत्री हैं।

राममंदिर निर्माण का पूरा हुआ सपना 

कल्‍याण सिंह के पूरे जीवन संघर्ष में राममंदिर आंदोलन की बड़ी भूमिका रही। उनके मुख्‍यमंत्रित्‍व काल में बाबरी ढांचा विध्‍वंस हुआ। उन्‍हें अपनी मुख्‍यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। हिन्‍दुत्‍ववादी नेता के तौर पर पहचाने जाने वाले कल्‍याण सिंह अक्‍सर कहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाए उन्‍होंने कारसेवकों पर गोली नहीं चलने दी। बाबरी ढांचा विध्‍वंस के बाद पूरी दुनिया में कल्‍याण सिंह को एक कट्टर हिन्‍दुत्‍ववादी नेता के रूप में पहचाना जाने लगा था। यह संयोग ही था कि उनके मुख्‍यमंत्री रहते बाबरी ढांचा विध्‍वंस हुआ और जब राममंदिर निर्माण मार्ग प्रशस्‍त हुआ तो वह दो-दो राज्‍यों के राज्‍यपाल बन चुके थे। राममंदिर निर्माण के रूप में कल्‍याण सिंह ने अपना सपना पूरा होता देखा। राज्‍यपाल पद से उनके रिटायरमेंट के समय राम मंदिर मुद्दा गरमाया हुआ था। कोर्ट में राम जन्मभूमि को लेकर सुनवाई हो रही थी। तीन महीने बाद इसका फैसला और अब राममंदिर निर्माण जोरों पर है।

दो बार उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री और राजस्‍थान के राज्‍यपाल रह चुके कल्‍याण सिंह की सियासत की डगर पर रफ्तार बहुत तेज रही न बहुत धीमी। वह 35 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने। मौका मिला तो अपने क्षेत्र के अलावा प्रदेश की राजनीति में भी सक्रिय नज़र आने लगे। अतरौली में कल्‍याण ने ऐसा झंडा गाड़ा कि 1967 में पहला चुनाव जीतने के बाद 1980 तक उन्‍हें कोई चुनौती ही नहीं दे सका। लेकिन 1980 के चुनाव में जनता पार्टी टूट गई तो कल्याण सिह को हार का सामना करना पड़ा।

दरअसल, कल्‍याण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जनसंघ में आए थे। जब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ और 1977 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उन्हे रामनरेश यादव की सरकार में उन्‍हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। 1980 में कल्‍याण पहली बार चुनाव हारे लेकिन उसी साल 6 अप्रैल 1980 को भाजपा का गठन हुआ तो कल्याण सिंह को पार्टी का प्रदेश महामंत्री बना दिया गया। उन्‍हें प्रदेश पार्टी की कमान भी सौंप दी गई।

इसी बीच अयोध्या आंदोलन की शुरुआत हो गई जिसमें उन्होंने गिरफ्तारी देने के साथ ही कार्यकर्ताओ में नया जोश भरने का काम किया। इस आंदोलन के दौरान ही उनकी इमेज रामभक्त की बन गई। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। राम मंदिर आंदोलन की वजह से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में भाजपा का उभार हुआ और जून 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। इसमें कल्याण सिंह की अहम भूमिका रही इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। इस तरह विधायक बनने के ठीक 24 वें साल 59 साल की उम्र में कल्याण सिंह यूपी के सीएम बन गए। हालांकि उनकी सरकार के दौरान ही बाबरी ढांचा विध्वंस हो गया तो इसका सारा दोष अपने ऊपर लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

कल्‍याण की अगुवाई में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा 

बाबरी ढांचा विध्‍वंस के बाद कल्याण सिंह बड़े हिंदुत्‍ववादी नेता बन गए। मुख्‍यमंत्री रहते कारसेवकों पर गोली चलाने से इनकार करने वाले कल्‍याण सिंह को इस मामले में अदालत ने एक दिन की प्रतीकात्‍मक सजा भी दी थी। कल्‍याण सिंह की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अनेक आयाम छुए। 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह अलीगढ़ के अतरौली और एटा की कासगंज सीट से विधायक निर्वाचित हुये। इन चुनावों में भाजपा कल्याण सिंह के नेतृत्व में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। लेकिन सपा-बसपा ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार बनाई और उत्तर प्रदेश विधानसभा में कल्याण सिंह विपक्ष के नेता बने।

पार्टी से नाराज हुए कल्‍याण, मुलायम के दोस्‍त बने 

इसके बाद 2007 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भी भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में लड़ा। लेकिन भाजपा को इसमें कोई बडी सफलता नहीं मिल सकी। 2009 में कल्याण सिंह भाजपा से फिर नाराज हो गए तो उन्होंने भाजपा का दामन छोड़ कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से नजदीकियां बढ़ा लीं। मुलायम सिंह की पार्टी के समर्थन से उस चुनाव में वह एटा से निर्दलीय सांसद चुने गये। लेकिन उस चुनाव में मुलायम सिंह यादव की पार्टी को बडा नुकसान हुआ। उनका एक भी मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सका। पार्टी में कलह हुई तो मुलायम सिंह ने कल्याण से नाता तोड़ लिया।

राष्‍ट्रीय जनक्रांति पार्टी का गठन 

इसके बाद कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय जनक्रान्ति पार्टी का गठन किया। यह पार्टी 2012 के विधानसभा चुनाव में कुछ विशेष नहीं कर सकी। एक बार फिर 2013 में कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी हुई तो 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्‍होंने भाजपा का खूब प्रचार किया। भाजपा ने अकेले अपने दम पर यूपी में 80 लोकसभा सीटों में से 71 लोकसभा सीटें जीतीं। नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो कल्याण सिंह को सितंबर 2014 में राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया। कल्याण सिंह को जनवरी 2015 से अगस्त 2015 तक हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा गया। अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने फिर से भाजपा की सदस्यता ले ली थी। पिछले काफी समय से वह अस्‍वस्‍थ चल रहे थे।

23 को होगा अंतिम संस्कार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके निधन पर शोक जताते हुए तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। इस अवधि में राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। मुख्यमंत्री ने कल्याण सिंह का अंत्येष्टि संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किए जाने की भी घोषणा की है।

कल्याण सिंह की हालत काफी नाजुक जानकर मुख्यमंत्री ने शनिवार शाम अपना गोरखपुर दौरा पहले ही रद्द कर दिया था और वह शनिवार शाम उन्हें देखने पीजीआई भी गए। रात करीब साढ़े नौ बजे कल्याण सिंह ने अंतिम सांस ली। सीएम रात में दोबारा पीजीआई पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजलि दी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार सोमवार 23 अगस्त को अलीगढ़ में किया जाएगा। इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहेगा। रविवार को कल्याण सिंह का पार्थिव शरीर विधानभवन में और इसके बाद भाजपा कार्यालय में दर्शन के लिए रखा जाएगा। दोपहर दो बजे उनका पार्थिव शरीर अलीगढ़ ले जाया जाएगा जहां 23 अगस्त को गंगा किनारे अंत्येष्टि होगी।

पीजीआई निदेशक डॉ. आरके धीमन ने बताया कि कल्याण सिंह चार जुलाई से पीजीआई में भर्ती थे। उन्हें लोहिया संस्थान से यहां शिफ्ट किया गया था। 21 जुलाई को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा था। उनके गुर्दे में संक्रमण होने की वजह से डायलिसिस चल रही थी।

इससे पहले 21 जून को परिजनों ने कल्याण सिंह की लार ग्रंथि में दिक्क्त होने पर उन्हें लोहिया संस्थान में भर्ती कराया था। अस्पताल में भर्ती के दौरान उन्हें दिल का दौरा व ब्रेन स्ट्रोक का आंशिक दौरा पड़ा था। चार जुलाई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कल्याण सिंह को लोहिया संस्थान देखने गए ठगे। वहां तबीयत ज्यादा नाजुक होने पर मुख्यमंत्री ने तुरंत कल्याण सिंह को पीजीआई शिफ्ट करने के निर्देश दिए थे। उसके कुछ घंटे बाद उन्हें पीजीआई के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग (सीसीएम) में भर्ती किया गया।

कल्याण से यह लोग मिले

एक अगस्त: गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
21 जुलाई: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह
आठ जुलाई: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा
20 जुलाई: राज्यपाल आनंदी बेन पटेल
4, 8, 18, जुलाई, एक अगस्त, 20 और 21 अगस्त: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
28 जुलाई: मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती
12 जुलाई: कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी
22 जुलाई: विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित
9 जुलाई: भाजपा के वरिष्ठ नेता शाहनवाज हुसैन

संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति: योगी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कल्याण सिंह के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि समाज, कल्याण सिंह को उनके युगांतरकारी निर्णयों, कर्तव्यनिष्ठा व शुचितापूर्ण जीवन के लिए सदियों तक स्मरण करते हुए प्रेरित होता रहेगा। प्रभु श्री राम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और शोक-संतप्त परिजनों को दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करें। राजनीति में शुचिता, पारदर्शिता व जन सेवा के पर्याय, अप्रतिम संगठनकर्ता एवं लोकप्रिय जननेता आदरणीय कल्याण सिंह का देहावसान संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जननेता के तौर पर उन्होंने आदर्श प्रस्तुत किया। राम मंदिर आंदोलन के वह अग्रणी नेता थे। उन्होंने हाशिए पर खड़े समाज के करोडों लोगों को आवाज दी।

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