एकांत सफ़र और जिज्ञासा
कभी कभी मन करता है, अकेले निकल पड़ूँ लम्बे सफ़र पर।तालाब, झील, नदी, समंदर सबको पार करके, बर्फ़ के पहाड़ों को पार करके, चंद्रमा पे कुछ समय गुज़ारूँ। अकेले। मंगल ग्रह पर चहलक़दमी करूँ, अकेले। कई प्रकाशवर्ष दूर किसी exo-planet पर वैसे नदी और पहाड़ देखूँ , जैसे पृथ्वी पर नहीं होते। अकेले। रुकूँगा नहीं कहीं पे ज़्यादा। सफ़र करता रहूँगा। उसमें ज़्यादा मज़ा आता है।
एक ही जगह पे रहो तो लगता है सब जान गए, इसके बारे में। जिज्ञासा का भी, पाप का जैसा होता है, वैसा घड़ा होता है, और वो जल्दी भर जाता है। जिज्ञासा फिर नए तरह से घेर लेती है चेतना को। चेतना के खोल को फाड़ कर वो नई दिशा में निकल जाती है, सोचने लगती है आगे क्या है, वहाँ क्या है, जहां मैं नहीं। वहाँ क्यूँ ना चले, जहां गए नहीं? ये “ज्ञात” का संसार है, या अज्ञात का ब्रह्मांड? और अज्ञात खूबसूरत लगने लगता है।
लेकिन रुकना तो है नहीं कहीं, फिर लौट के आओ, तो लगता है, अरे, यहाँ के बारे में कहाँ पूरा जाने थे? “ज्ञात” नई विमाओं में, नयेपन में दिखता है।
ये सिर्फ़ सोच रह जाती है। एकांत से उपजी। बचपन से ये सोच मूर्तरूप हुई नहीं। डर लगता है कि इतना लम्बा सफ़र कर पाएँगे? अकेले? इतनी भीड़ है अगल-बग़ल।ठहरी हुई भीड़। भीड़ की हक़ीक़त और एकांत की कल्पना ने भीड़ में अकेला रहने का आदी बना दिया।सोच में पूरा ब्रह्मांड घूम लिए, अकेले।हक़ीक़त में……….. ब्रह्मांड मुझमें घूम रहा है, अकेले।
आईपीएस मयंक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से….














