विशेष अदालतों में नियुक्त होने वाले न्यायाधीशों को ऐसे जटिल वित्तीय अपराधों से निपटने और मुकदमे को शीघ्रता से निपटाने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए और उन्हें शीघ्रता से दोषी ठहराया जाना चाहिए। इसी प्रकार, यदि कोई निर्दोष है, तो उसे शीघ्र रिहा किया जाना चाहिए…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जटिल आर्थिक अपराधों के आरोपियों को पकड़ने के लिए वित्त और अन्य क्षेत्र के विशेषज्ञों की ओर से वैज्ञानिक जांच की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे अपराधों के मामलों में फैसला सुनाने के लिए अब विशेष अदालतों के गठन का समय आ गया है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने छत्तीसगढ़ के कोयला लेवी घोटाले में आरोपी व्यवसायी सूर्यकांत तिवारी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि विशेष अदालतों में नियुक्त होने वाले न्यायाधीशों को ऐसे जटिल वित्तीय अपराधों से निपटने और मुकदमे को शीघ्रता से निपटाने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए और उन्हें शीघ्रता से दोषी ठहराया जाना चाहिए। इसी प्रकार, यदि कोई निर्दोष है, तो उसे शीघ्र रिहा किया जाना चाहिए।
पीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी से कहा कि न्यायाधीश शून्य में न्याय नहीं करते। उन्हें पूर्ण न्याय के लिए सक्षम अभियोजकों और जांचकर्ताओं की आवश्यकता होती है। पीठ ने आगे कहा, क्या आपके राज्य में वित्तीय अपराधों के लिए एक समर्पित जांच शाखा है? आपके पास एक आर्थिक अपराध शाखा तो है, लेकिन हो सकता है कि आपके पास फोरेंसिक अकाउंटेंट न हों, जो लेन-देन के जाल का विश्लेषण कर सकें। आमतौर पर, वित्तीय अपराधों का निपटारा वर्तमान में स्वीकारोक्ति के आधार पर होता है। स्वीकारोक्ति के लिए, आपको किसी को जेल में डालना पड़ता है और जानकारी निकालने और मामले को साबित करने की कोशिश करनी पड़ती है।
डार्क वेब पर अपराध की जांच कैसे करेंगे : पीठ ने आगे पूछा, क्या यह 19वीं सदी की पुरानी जांच है? अपनी जांच का हाल देखिए। कल, आपके पास डार्क वेब पर अपराध होंगे, जहां धन का हस्तांतरण क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से होगा। उस क्षेत्र में आपकी क्षमता निर्माण कहां है? आज, शुक्र मनाइए कि कथित रिश्वत लेने वालों ने मुद्रा में पैसा लिया।
विशेष अदालतें राज्यों की प्राथमिकता नहीं
जस्टिस कांत ने कहा कि आजकल अधिकांश राज्यों के पास जघन्य अपराधों में शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष, नामित अदालतें गठित करने की वित्तीय क्षमता नहीं है। हर महीने की 31 तारीख तक, वे वेतन देने के लिए धन जुटाने का प्रयास करते हैं। उनके पास वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए विशेष कानूनों के लिए समर्पित अदालतें उनके लिए सबसे कम प्राथमिकता वाली हैं। बेशक, भारत संघ उनकी मदद कर सकता है और समर्पित अदालतें स्थापित कर सकता है और इसलिए हमने इस मुद्दे पर केंद्र से कुछ मामलों में जवाब मांगा है।
















