भिलाई। छत्तीसगढ़ के आईपीएस अफसर मयंक श्रीवास्तव के लेख नवरस: घृणा इन दिनों चर्चे का विषय बना हुआ है। 03 मार्च को फेसबुक में पोस्ट किये गए इस लेख को अब तक 1300 से ज्यादा लोगो ने LIKE किया है, 343 लोगों ने अब तक इस पर अपनी प्रतिक्रिया (comments) दी है वही चार लोगों ने इसे शेयर भी किया है। यह लेख चार रसों पर आधारित है। आप भी पढ़िए आखिर क्या लिखा है इसमे….
नवरस: घृणा
कौन सा भाव सर्वाधिक इंटेन्स होता है, और ज़्यादा समय तक बना रहता है?
भरत मुनि (“नाट्यशाष्त्र” (4थी सदी ईपू – 1ली सदी)के रचयिता ) ने नौ रसों (भावों) में से मूल रूप से 4 रस, काव्य/नाट्य या वृहद् स्तर पर कह लें तो, साहित्य में, माने हैं। भरत ने प्रथम आठ रसों में शृंगार, रौद्र, वीर तथा वीभत्स को प्रधान मानकर क्रमश: हास्य, करुण, अद्भुत तथा भयानक की उत्पत्ति मानी है। शृंगार से हास्य, रौद्र तथा वीर कर्म करुण तथा अद्भुत एवं वीभत्स दर्शन से भयानक उत्पन्न होता है।
घृणा और ग्लानि से परिपुष्ट होकर वीभत्स रस बनता है जिसका स्थायी भाव जुगुप्सा है।
अगर भरत के 4 प्रधान रसों में से वीभत्स की तुलना श्रृंगार, रौद्र एवं वीर रसों से करें, तो इंटेन्सिटी में तो सब शायद एक ही जैसे लगें, परंतु स्थायित्व में मुझे लगता है कि वीभत्स ही अधिक स्थायी है। एक बार ये घर कर जाए, तो मरते दम तक रहती है, जबकि वीर और रौद्र तो नितांत क्षणिक और श्रृंगार “बेचारा” सा रस है, बरस कर तृप्त होकर बैठ जाता है। घृणा, इतनी लम्बी रहती है कि लगता है कि यही एकमात्र “मूल” भाव है मनुष्यों में।
इस को विभिन्न युगों में विभिन्न नेतृत्वकर्ताओं ने विभिन्न ढंग से अपने आधार बनाने में प्रयोग किया, जैसे किसी ने किसी दूसरे वर्ग/क्षेत्र के लोगों के विरुद्ध घृणा फैलाई, और उस से उपजी स्थायी ऊर्जा, नकारात्मक ही सही, को अपने राज्य/क्षेत्र बनाने में उपयोग किया। दूसरी संस्कृति वालों, भाषा-बोली वालों, रंग-रूप वालों, आदि के विरुद्ध घृणा से उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग कुछ ने स्वार्थ पूर्ति के लिए किया। दर’असल लगाव से ज़्यादा, घृणा ने, एक वर्ग को एक क्लोज़्ड कम्यूनिटी बनाने में अधिक भूमिका निभाई है।
क्यूँकि घृणा बहुत महीन ढंग से खुद के लिए superiority कॉम्प्लेक्स पैदा करती है, जिससे घृणित के प्रति वितृष्णा और बनती है, वहीं अपने तरह के लोगों में एकात्म आता है। घृणा का जवाब, महापुरुष और मसीहा भले कुछ भी कहते रहे हों, घृणा ही होता रहा है। तुम मुझसे घृणा करोगे, तो मैं भी तुमसे, प्यार नहीं, घृणा ही करने लगूँगा।
शोर में नफ़रत के मेरी बात ज़ाया हो गई
मेरा कहना और था उनका समझना और था
– सय्यद रहीम















