भिलाई। छत्तीसगढ़ के आईपीएस ऑफिसर मयंक श्रीवास्तव ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर ट्रक भर के मासूमियत शीर्षक से एक लेक पोस्ट किए है जिसे बहुत ही सराहा जा रहा है। लोगो लगातार उस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कमेंट्स कर रहे है। इस लेख पर अब तक 100 से ज्यादा कॉमेंट्स और 400 से ज्यादा लाइक्स मिल चुकी है। आप भी पढ़े यह लेख….
ट्रक भर के मासूमियत
वो कौन थी जो मुस्कुरा के चली गई?- बड़ा मासूम सा सवाल लिखा था एक ट्रक के पीछे. इतना मासूम कि मैं भी मुस्कुरा उठा. यूँ तो किसी भी ट्रक में और ट्रक वालों में मासूमियत की कोई कमी नहीं है. फिल्मों में इस गीत के आने के बहुत पहले से वो सुंदरियों को चेतावनी देते आ रहे हैं कि “हँस मत पगली, प्यार हो जायेगा”. छत्तीसगढ़ी में तो इस वैधानिक चेतावनी पर फिल्म भी बन चुकी है-“हँस झन पगली, फँस जाबे”. ऐसा नहीं कि वो सिर्फ हसीनाओं को ही चेतावनी देते हैं. बहुत साफ़ और सीधा होता है ट्रक-शायर का दिल. “दम है तो क्रास कर, नहीं तो बरदास कर” (बरदास, दरअसल बरदाश्त का ट्रकीय-शायराना रूपांतरण है) से उन्होंने हर आम-ओ-ख़ास सड़कीय सरिसृपों को “आम-सूचना” रुपी चेतावनी दे रखी है. आम-ख़ास में भेद न करने के कारण उन्हें आज के भारत का सच्चा समाजवादी कहा जा सकता है, और जिस प्रदेश में समाजवादी का अभी भी स्कोप हो, उसमे वो अपना हक मांग सकते हैं. ऐसी बहुत सी चेतावनियाँ वो, तीव्र-वाहन चालकों के लिए विशेष तौर पे, साहित्यिक ढंग से देते है. पेशे-ख़िदमत है ऐसे ही दो प्रांजल भाषा युक्त साहित्य-मुक्ताफल –“
गाड़ी चलाते समय सौंदर्य दर्शन न करें, वरना देव दर्शन हो सकते हैं- जनहित में जारी” और “सावधानी हटी, सब्जी पूड़ी बँटी”. बातें बहुत ही व्यावहारिक हैं.
एक वाक्य जो ट्रक साहित्य के दीवान में ख़ूबसूरत ग़ज़ल है, वो है ये सरल सा वाक्य-“ सोच कर सोचो, साथ क्या जाएगा”. पता नहीं इस वाक्य के ज़रिये वो भक्त को क्या ज्ञान देना चाहते हैं- शायद ये कि सोचने जैसा फ़ालतू काम करने से पहले भक्त को “सब माया है”, जानकर कुछ सोचना नहीं चाहिए, या ये कि इस गुरुतर दार्शनिक प्रश्न कि “साथ क्या जायेगा”, ये सोचने से पहले, वार्म-अप टाइप से हल्का दर्शन अभ्यास रूप में कोई एक मिनी- सोच कर लेनी चाहिए, जैसे कि “अब भगवान् ही बचाएं इन तीनों से; डॉक्टर पुलिस और खूबसूरत हसीनों से” आदि. जो भी उनका मंतव्य हो, लेकिन ये दर्शन बहुत गूढ़ है. वैसे जिस ट्रक के पीछे मैंने ये दार्शनिक ज्ञान पढ़ा था, उसीपे इस वाक्य के नीचे दूसरा वाक्य “माँ का आशीर्वाद” भी लिखा था. वैसे सभी ट्रक वालों (मालिकों?) को ये पूरा यक़ीन होता है कि उसके ट्रक से लोग जलते हैं, अपने गाड़ी के नंबर के दो टुकड़े कर वो बड़े कलात्मक ढंग से ऐसे बुरी नज़र वालों को ताना देता है, माना कि गाड़ी का नंबर cg 07 ab1230 है, तो अर्ज़ किया है, ग़ौर फ़रमाइयेगा- “12 के फूल 30 की माला, बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला”. बुरी नज़र डालने वाला, इस गणित में पड़े बिना कि 12 के फूल होने पर माला 30 की कैसे है, इस शायराना ताना के बाना से बिंध जाता है (मेरे ट्रकीय तुकबन्दी हेतु मैंने साहित्यिक स्वतन्त्रता ली है, उसके लिए क्षमा करेंगे. ताना के बान को मैंने बाना कर दिया है. वैसे ग़ालिब जैसे बड़े शायर और ट्रक-शायर, दोनों भी तो ये साहित्यिक स्वतन्त्रता लेते हैं- ग़ालिब ‘पर’ को ‘प’ कर देते थे, ‘यहाँ’ को ‘याँ’). कभी-कभी यही बात वो मासूमियत से पूछते हैं,”मेरी चलती है, तो आपकी क्यूँ जलती है?”. इन नए ट्रक-साहित्यकारों ने लेकिन हर जगह की तरह यहाँ भी परम्पराओं की …एक कर दी है, देखिये न अब नए लौंडे ये लिखने लगे हैं-“न कोई नज़र बुरी होती है, न कोई मुंह काला होता है; सब कुछ करने वाला तो भाई, ऊपर वाला होता है”.
परन्तु, भाईसाहब, भाषा और काव्यात्मक लहज़ा तो आज भी एलिटिस्ट व्यभिचार है. हम इन आधारों पर उनके मनोभावों को तुच्छ नहीं मान सकते. व्यथा और दर्द हर भाषा, हर अलंकार, हर लहज़े में उभर सकता है. “ऐ मालिक क्यूँ बनाया गाड़ी बनाने वालो को; घर से बेघर कर दिया गाड़ी चलाने वालों को”- देखता हूँ जब इनके लगभग अंतहीन सफ़र को, और ये लिखा देखता हूँ- “घर कब आओगे?”- मासूमियत का अंतर्नाद है ये, वास्तविकता की व्यथा है, अपूर्ण आकांक्षाओं के बहते आंसुओं जैसा दयनीय. पहले लगता था मुझे कि मेरा काम ही दुनिया का सबसे कठिन और कृतघ्न काम है. नहीं जानता था कि अपनी ज़मीन से बेदखल होकर अपने ट्रक में निरंतर चला जा रहा बन्दा किस ज़मीन की ओर जा रहा है. कितने कठिन काम हैं दुनिया में- ऐक्टर के, डायरेक्टर के, डॉक्टर के, सफाई करने वालों के, …ट्रक ड्राईवर के.












