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अपने विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों को परिवार के रूप में साथ लेकर काम करता हूं : नोहर सिंह ठाकुर

दुर्ग (सारनाथ एक्सप्रेस)। मैं मूलत: गिदर्री, डोंगरगांव (राजनांदगांव) से हूं, मेरा परिवार बहुत ही गरीब था। वैसी ही स्तिथि हमारे गांव की थी, गांव में बिजली का अभाव था, पीने का पानी भी नही था, कुआँ से काम चलाना पड़ता था। गर्मी के दिनों में तालाब में झरिया बनाते थे तब पूरा गांव पानी पीता था और नहाने-धोने के लिए गांव वाले भीमपुरी डैम जाते थे। गांव में मैं गाय-भैस चराने का काम करता था। जीवन मे बहुत ही स्ट्रगल करके यहां तक पहुंचा हूं। यह सब बातें नोहर सिंह ठाकुर, सहायक आयुक्त आबकारी, दुर्ग ने विशेष बातचीत में सारनाथ एक्सप्रेस से कही। इन्होंने अपने अब तक सफर को हमसे साझा किया। 

आबकारी आयुक्त नोहर सिंह ठाकुर प्रारंभिक शिक्षा पुनारकसा (बालोद) के शासकीय स्कूल में पहली, दूसरी और तीसरी तक हुई थी। चौथी और पांचवी की पढ़ाई इन्होंने गिदर्री (राजनांदगांव) से किया था। कक्षा पांचवी में पूरे ब्लॉक में द्वितीय आये थे। कक्षा छठवीं से हायरसेकंडरी तक कि शिक्षा इन्होंने डौंडी (दल्लीराजहरा) के आदर्श आवासीय स्कूल से पूर्ण किया था। हायरसेकंडरी के बाद इन्होंने कॉलेज की पढ़ाई के लिए छत्तीसगढ़ कॉलेज, रायपुर में प्रवेश लिया और पेंशनवाडा होस्टल में रहकर इन्होंने वर्ष 2000 में आट्र्स सब्जेक्ट में स्थानक की डिग्री हासिल किया। फाइनल ईयर में पहुंच के साथ ही इन्होंने अपने मामा से प्रेरित होकर पीएससी की तैयारी शुरू कर दी थी और पीएससी को अपना लक्ष्य बना लिया था। पीएससी की कोचिंग शुरू की और वर्ष 2002 का पीएससी क्लियर कर लिया था लेकिन उस समय इनकी उम्र 21 वर्ष नही होने के कारण इनका पीएससी मेन्स का पेपर रिजेक्ट कर दिया गया था। वर्ष 2001 का इन्होंने यूपीएससी एग्जाम भी क्लियर किया परन्तु नया एग्जाम होने के कारण आगे नही बढ़ पाये। इन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और वर्ष 2003 के पीएससी में इन्हें सफलता मिली और यह जिला आबकारी अधिकारी के लिए चयनित हुए। पीएसपी में सफलता के बाद भी इन्होंने यूपीएससी की तैयारी जारी रखी लगातार पांच बार मेन्स एग्जाम तक पहुंचे पर सफल नहीं हो पाए। वर्ष 2006 में इन्हें ट्रेनिंग के लिए दुर्ग जिला मिला जहां इन्होंने अठारह माह का ट्रेनिंग पूर्ण किया।

इनकी पहली पोस्टिंग जिला आबकारी अधिकारी के पद पर धमतरी में हुआ जहाँ इन्होंने चार वर्षों तक अपनी सेवाएं दी, फिर यह बलौदाबाजार में पंद्रह माह, महासमुंद में पंद्रह माह, सूरजपुर में छह माह, कोरबा में ढाई साल, रायगढ़ में एक साल, दुर्ग में एक साल तथा रायपुर में छह माह सेवाएं देने के बाद जून 2020 में सरकार ने इन्हें दुर्ग जिले की जिम्मेदारी सौंपी है जिसे यह जिम्मेदारी के साथ निभा रहे है। वर्ष 2014-15 में इन्हें प्रमोशन मिला और यह जिला आबकारी अधिकारी से सहायक आयुक्त आबकारी बनाये गए।इनके पिता जी उस समय के मैट्रिक पास थे। वह पटवारी की नौकरी करने के बाद नौकरी छोड़कर समाजसेवा कार्य मे जुड़ गया और गांव के सरपंच बने। इनके नाना शिक्षक थे और वह  खरखरा डैम के पास अर्जुनी गांव में रहते थे लेकिन वहां का घर डूब जाने के बाद वह पुनारकसा में आ बसे। इनके नाना जी की पढ़ाई के प्रति बहुत रूझान था और वह बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित किये। इनके नाना ने इनके मामा को दुर्ग में लाकर पढ़ाई के लिए भर्ती कराया और यह ट्राइबल हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी की। इनके मामा बीएस नायक रायपुर जिला पंजीयक है तथा बड़े नाना के लड़के आरएस नायक आईजी होकर रिटार्यड हुए है।अपने माता-पिता को अपना आदर्श मानने वाले नोहर सिंह ठाकुर अपने लाइफ स्टाइल से जीवन व्यतीत करते आये है। रोजाना अल सुबह उठना, मॉर्निंग वॉक करना, परिवार को समय देना, समय पर ऑफिस जाना, किताबे पढऩा, फाइनेंशियल मैटर में रुचि रखना, देश की आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखना इनकी दिनचर्या में शामिल है।

सहायक आयुक्त नोहर सिंह ठाकुर ने बताया कि मेरा परिवार कृषक है, मैं जब मैट्रिक में था तभी मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया था जिसके कारण मुझे और मेरे परिवार को बहुत स्ट्रगल करना पड़ा, मेरी माताजी ने मुझे पढा-लिखा कर इस काबिल बनाया। पढ़ाई के लिए उन्होंने खेत तक बेच दिया था ताकि मैं पढ़-लिख कर एक बड़ा आदमी बन सकू। बचपन से ही मैं खेती-किसानी किया हूं तो इनसे रुचि रहती है। खेल-कूद में बचपन से रुचि रही है, समाचार पत्र पढऩे, रेडियो पर समाचार सुनने, सामान्य ज्ञान की जानकारी में शुरू से लगाव रहा जिसके कारण मुझे एग्जाम में बहुत हेल्प मिला।  ग्रामीण परिवेश से मुझे विशेष लगाव है। मैं कर्म करने पर विश्वास रखता हूं, इसलिए अपने निर्णय खुद ही लेता हूं। लाइफ में इतना स्ट्रगल किया हु की हर चीज को समझता हूं,लाइफ से समझौता नही करता। कार्य के प्रति हमेशा ईमानदारी और निष्ठा रखता हूं। सबसे यादगार पल छात्रवास में रहकर जीवन यापन करना है। कार्य करने का उद्देश्य यही रहता है कि अपने व्यवहार को संयमित रखकर अपने अधीनस्थ अधिकारी कर्मचारी को परिवार के रूप में साथ लेकर काम करू ताकि उनको कोई दिक्कत न हो काम करने में। उनसे बेहतर सामंजस्य बनाकर कार्य करूँ, उनकी समस्यों का समाधान करूँ ताकि वो फ्री माइंड होकर बेहतर कार्य कर सके। इनकी पत्नी गृहणी तथा दो पुत्रियां है जो अध्ययनरत है।

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