विधवा बहुओं को सिर्फ इस आधार पर बाहर करना कि उनके पति ससुर से पहले या बाद में मरे, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। आधार पर बाहर करना कि उनके पति ससुर से पहले या बाद में मरे, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। पीठ ने कहा है कि ऐसे भेदभाव का कानून के मकसद से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ‘ससुर की मौत हो जाने के बाद, जो बहू विधवा हो जाती है, वह हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत उनकी (ससुर) संपत्ति से भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अधिनियम की धारा 21 (vii) के तहत ‘उसके बेटे की कोई भी विधवा’ अभिव्यक्ति स्पष्ट है और इसमें सभी विधवा बहुएं शामिल हैं और यह मायने नहीं रखता है कि बेटे (पति) की मौत पिता (ससुर) से पहले हुई हो या बाद में।’ जस्टिस पंकज मिथल और जज एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया है।
दरअसल, दिसंबर 2021 में एक व्यक्ति (ससुर) की मौत हो गई। उनकी मौत के बाद मार्च 2023 में उनके एक बेटे की मौत हो गई। इसके बाद महिला ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम के तहत ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग की।
हालांकि फैमिली कोर्ट ने विधवा बहू की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि वह अपने ससुर की मृत्यु के समय विधवा नहीं थीं। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस मामले में विधवा बहू के हक में फैसला दिया और परिवार अदालत को महिला (विधवा बहू) आश्रित के रूप में योग्य मानते हुए योग्यता के आधार पर भरण पोषण की राशि तय करने का निर्देश दिया। इस फैसले के खिलाफ मृतक व्यक्ति (सुसर) के दूसरे बेटे की विधवा और उस व्यक्ति के साथ लंबे समय तक लिव इन में रहने का दावा करने वाली महिला ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 21 में ‘आश्रितों’ को परिभाषित किया गया है और इसकी उप-धारा (viii) में कहा गया है ‘उसके बेटे की या उसके पहले मर चुके बेटे बेटे (पोते) की कोई भी विधवा, जब तक वह दोबारा शादी नहीं कर लेती, बशर्ते और इस हद तक कि वह अपने पति की संपत्ति से या अपने बेटे या बेटी से, यदि कोई हो, या उसकी संपत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो, या पोते की विधवा के मामले में, अपने ससुर की संपत्ति से भी।’ शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 21 (vii) स्पष्ट रूप से ‘उसके बेटे की किसी भी विधवा को आश्रित के रूप में मान्यता देती है, बशर्ते वह अपने पति की संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विधवा बहुओं को सिर्फ इस आधार पर बाहर करना कि उनके पति ससुर से पहले या बाद में मरे, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। आधार पर बाहर करना कि उनके पति ससुर से पहले या बाद में मरे, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। पीठ ने कहा है कि ऐसे भेदभाव का कानून के मकसद से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है, जिसका मकसद उन आश्रितों को भरण-पोषण देना है जो अपना भरण-पोषण खुद नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी तकनीकी व्याख्या के आधार पर भरण-पोषण से इनकार करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा, क्योंकि यह विधवा महिलाओं को गरीबी में धकेल सकता है और गरिमा के साथ जीने के उनके अधिकार को कमजोर कर सकता है।
















