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गोवर्धन पूजा प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा का प्रतीक, जानिए पूजा विधि, मंत्र और शुभ मुहूर्त?

गोवर्धन पूजा, दीपावली के बाद मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण पर्व है, जिसकी जड़ें पौराणिक कथाओं और ग्रामीण परंपराओं में गहराई से जुड़ी हैं. यह पूजा श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र की वैदिक पूजा के विरोध में स्थापित की गई थी, जिसमें प्रकृति, पशुधन और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है…

 

 

मथुरा (ए)। दीपावली के बाद परवा यानी प्रथमा तिथि को गोवर्धन पूजा मनाई जाती है. पांच दिन की पर्व परंपरा में ये ऐसा पहला त्योहार है, जिसका वैदिक आधार तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसकी मान्यताएं सीधे पौराणिक कथाओं से निकल कर सामने आई हैं. गोवर्धन पूजा का जिक्र श्रीमद्भभागवत पुराण, महाभारत और हरिवंश पुराण में मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित यह पूजा असल में विशुद्ध ग्रामीण परंपरा की पूजा पद्धति की झलक है. जिसे समुदाय, संगठन या फिर एक परिवेश के लोगों के द्वारा मिलजुल कर किया जाता है।

गोवर्धन पूजा का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा से भी जुड़ा हुआ है। इसे प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व माना जाता है, जिसमें लोग दान और पुण्य कार्य करते हैं। इस दिन को लेकर कुछ असमंजस हो सकता है, लेकिन भारतीय समाज में इसका उल्लास और श्रद्धा पहले जैसा ही बना रहता है। गोवर्धन पूजा न केवल श्री कृष्ण की महिमा का जश्न है, बल्कि यह हम सभी को प्रकृति और उसकी शक्ति का सम्मान करने की प्रेरणा भी देता है।

महाभारत में प्रसंग आता है कि ब्रज (गोकुल, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव) के लोग वैदिक आधार पर इंद्र की पूजा करते थे. इंद्र की इस वैदिक पूजा में समय के साथ बहुत आडंबर आ चुका था, साथ ही इस पूजा में आस्था का अभाव और डर का समावेश अधिक हो चुका था. बड़े यज्ञ अनुष्ठान में कई-कई दिनों की मेहनत से तैयार हुए दूध, दही, घी, छाछ  और यहां तक की नई फसल का बहुत सा हिस्सा भी इंद्र यज्ञ में खर्च होता था।

इसके साथ ही प्रकृति से भी लोगों का जुड़ाव कम था, तब श्रीकृष्ण ने इंद्र की इस पूजा का विरोध किया और सबको सलाह दी कि इसके स्थान पर नदी, ग्राम, गोधन, पशुधन, धरती माता, वृक्ष और इस पवित्र गोवर्धन पर्वत की पूजा की जानी चाहिए. क्योंकि नदी का जल जीवन देता है. गोधन से ही जीवन यापन के लिए दूध-दही, घी मिलता है. पशुधन किसान के बराबर ही मेहनत करते हैं ताकि अनाज उगाया जा सके. धरती अपने सीने पर हल की नोक सहकर भी बीज उत्पादन कर अनाज देती है. वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं और गोवर्धन ब्रज क्षेत्र की सीमा बनकर सुरक्षा देता है. वर्षा होने में सहायक होता है।

किशोर कृष्ण की बात मानकर नंदबाबा और सभी ग्रामीणों ने इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन पूजा की थी. तब क्रोधित देवराज ने ब्रज क्षेत्र को डुबो देने का निश्चय किया. सात दिन की घोर वर्षा हुई. तब श्रीकृष्ण ने लोगों की सुरक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर थाम लिया. सात दिनतक वह यूं ही खड़े रहे और इंद्र का क्रोध और उसके अभिमान को आंखें दिखाते रहे।

आखिर देवराज इंद्र ने हार मानी. उन्होंने श्रीकृष्ण के परब्रह्म स्वरूप को पहचाना और फिर उनकी शरण में गए. इस तरह श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र पर विजय पाई।

हरिवंश पुराण और भागवत पुराण में वर्णित यही कथा आज के गोवर्धन पूजा का आधार है. श्रीकृष्ण ने आठ दिन के पर्व की नींव डाली थी. जिसमें परवा (प्रथमा) के दिन गोवर्धन पूजा से लेकर कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिन गोपाष्टमी तक के पर्व शामिल थे. ब्रजवासी आठ दिनों तक प्रकृति की पूजा का उत्सव मनाते थे, जिसमें अन्न, नदी, जंगल, धरती और उनके पशुधन शामिल थे।

आज गोवर्धन पूजा श्रीकृष्ण के उसी गिरधारी स्वरूप के स्मरण का दिन है. गोवर्धन पर्वत अब खुद में एक लोकदेवता हैं. वह कई अलग-अलग परिवारों के कुल देवता भी हैं. ऐसा भी मानते हैं कि श्रीकृष्ण ही अपने अचल स्वरूप में गोवर्धन पर्वत हैं. मथुरा के ब्रज क्षेत्र से लेकर राजस्थान की नाथ परंपरा तक में गिरधारी स्वरूप की बड़ी मान्यता है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकल कर, राजस्थान, गुजरात और फिर महाराष्ट्र के सागरीय तट तक पहुंचती है. जिसमें स्वरूप कोई भी हो, मूलरूप से श्रीकृष्ण की ही पूजा होती है।

गोवर्धन पूजा तिथि 
गोवर्धन पूजा 2025 इस साल 22 अक्तूबर को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 21 अक्तूबर को शाम 5:54 बजे होगी और इसका समापन 22 अक्तूबर को रात 8:16 बजे होगा। तिथि के हिसाब से इस बार गोवर्धन पूजा 22 अक्तूबर को ही सही समय पर मनाई जाएगी।

गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त
गोवर्धन पूजा 2025 के लिए शुभ मुहूर्त इस साल दोपहर 3:13 बजे से लेकर शाम 5:49 बजे तक रहेगा। इस दौरान स्वाति नक्षत्र और प्रीति योग का संयोग बनेगा, जो पूजा के लिए बेहद शुभ माना जाता है। खास बात यह है कि इस दिन सूर्य तुला राशि में और चंद्रमा भी गोचर करेंगे, जिससे यह समय विशेष रूप से कल्याणकारी और शुभ रहेगा। इस समय में पूजा करने से भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होने की संभावना अधिक होती है।

मंत्र जप करें
गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक।
विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव।।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे॥

‘ॐ श्री कृष्णाय शरणं मम्।’

गोवर्धन पूजा विधि 
  • गोवर्धन पूजा के दौरान सबसे पहले गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है, जिसे घर के आंगन या किसी खुले स्थान पर रखा जाता है।
  • फिर इस आकृति पर रोली और चावल चढ़ाए जाते हैं, जो पूजा की शुरुआत का प्रतीक होते हैं।
  • इसके बाद, गोवर्धन के पास दीपक जलाया जाता है ताकि वातावरण में पवित्रता और शुभता का वास हो।
  • पूजा में खीर, पूरी, बताशे, जल, दूध और केसर भी अर्पित किए जाते हैं, जो भगवान श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत को समर्पित होते हैं।
  • इसके बाद सभी परिवारजन मिलकर गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं, जो पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह परिक्रमा श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
  • अंत में, पूजा के समापन पर आरती की जाती है और यदि पूजा में कोई भूल हो गई हो तो उसका क्षमा भी मांगा जाता है।
  • इस पूरी प्रक्रिया से जीवन में सकारात्मकता, समृद्धि और शांति आती है।

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