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आज इस समय से शुरू होगा अखंड सौभाग्यवती का व्रत करवा चौथ, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और अन्य डिटेल?

हिंदू धर्म के अनुसार, किसी भी व्रत को रखने से पहले संकल्प लेना बेहद जरूरी है। तभी आपका उपवास पूरा होता है। ऐसे ही करवा चौथ का व्रत रखने के लिए हाथ में फूल और कुछ अक्षत लेकर शिव-पार्वती के समक्ष व्रत रखने का संकल्प लें। इसके बाद उन्हें फूल, अक्षत अर्पित कर दें…

 

नईदिल्ली (ए)। अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह व्रत हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और शाम को सोलह श्रृंगार कर चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करती हैं। इस वर्ष का करवा चौथ विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है, क्योंकि सिद्धि, शिवावास योग जैसे मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। यह योग व्रत के फल को कई गुना बढ़ाने वाले माने जाते हैं।

हिंदू धर्म में करवा चौथ व्रत का विशेष महत्व होता है। इस व्रत में सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की मनोकामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं सुबह से बिना कुछ खाए पीये व्रत रखती हैं और शाम को करवा चौथ की पूजा और कथा सुनने के बाद चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूरा करती हैं।

करवा चौथ का व्रत प्रमुख रूप से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब , हरियाणा, उत्तराखंड और राजस्थान में बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। करवा चौथ व्रत में सुगागिन महिलाएं 16 श्रृंगार करते हुए छलनी से चांद को देखती है फिर पति के हाथों के जल ग्रहण कर व्रत का पारण करती हैं। आइए जानते हैं इस शुभ अवसर पर करवा चौथ का शुभ मुहूर्त, पूजन सामग्री, चंद्रोदय का समय, व्रत कथा सहित अन्य जानकारी…

व्रत शुरु होने का समय- पंचांग के अनुसार, करवा चौथ व्रत सुबह 6:19 बजे से लेकर रात 8:13 बजे तक रहेगा। इस प्रकार, व्रति महिलाओं का व्रत लगभग 14 घंटे का होगा।

चंद्र दर्शन और व्रत खोलने का समय- करवा चौथ की रात चांद के दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है। इस वर्ष चांद का उदय रात 8:13 बजे होगा। चांद के दर्शन के बाद महिलाएं छलनी से चांद और फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत का पारण करती हैं।

करवा चौथ पूजा मुहूर्त – 05:57 PM  से 07:11 PM

अवधि – 01 घण्टा 14 मिनट्स

 

पूजा विधि

  • करवा चौथ के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर लें और उसके बाद सरगी ग्रहण करें।
  • इसके बाद पूजा मुहूर्त के समय एक साफ चौकी पर करवा माता की तस्वीर रखें।
  • फिर एक साफ थाली लेकर उसमें सिंदूर, दीपक, गंगाजल, अक्षत और हल्दी रखें।
  • इस दौरान आप थाली में फूल और गुड़ भी अवश्य रखें।
  • अब चौकी के पास एक नए कलश में साफ जल भरकर उसे रख दें।
  • अब दीप प्रज्ज्वलित करें और धूपबत्ती जला लें।
  • माता करवा को फल, हल्दी, अक्षत और ताजे फूल अर्पित करें।
  • इसके बाद करवा चौथ के व्रत की कथा सुनें और सभी बड़ों से आशीर्वाद लें।
  • अब चंद्रमा के निकलते ही उसे जल अर्पित करें।
  • इसके बाद साफ नई छलनी के माध्यम से चंद्रमा देखें और फिर उसी से पति की ओर देखें।
  • फिर आप पति के हाथों से व्रत का पहला जल ग्रहण करें और उनका आशीर्वाद लें।
  • इसके बाद सुहागिन महिलाओं को कुछ वस्त्र व अन्न दान करें और उनका आशीर्वाद लें।
  • अंत में व्रत का पारण करते हुए जाने अनजाने में हुई गलतियों की क्षमा मांगें।
करवा चौथ व्रत के नियम
  • करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले ही सरगी ग्रहण करनी चाहिए।
  • व्रत में भूलकर भी काले रंग के वस्त्र व इस रंग की चीजों का उपयोग भी न करें।
  • करवा चौथ के व्रत की कथा 16 श्रृंगार और लाल जोड़े में सुननी चाहिए।
  • चंद्रमा देखने के बाद ही व्रत का पारण करें।
  • मन को शांत रखें और किसी भी तरह का नकारात्मक भाव मन में न रखें।
  • संध्या के समय पूजा अवश्य करें।
  • इस दिन तामसिक चीजों का सेवन करें।
  • चंद्रमा को अर्घ्य दें और सुहागिनों को क्षमतानुसार चीजें दान करें।
  • निर्जला उपवास रखें।
क्या है सरगी का धार्मिक महत्व?
करवा चौथ के व्रत की शुरुआत जिस परंपरा से होती है, वह है सरगी। इसका मुख्य उद्देश्य शारीरिक ऊर्जा प्रदान करना है, लेकिन इससे कहीं अधिक इसका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। यह सरगी सास द्वारा बहू को दी जाती है, जो आशीर्वाद और स्नेह का प्रतीक मानी जाती है। इसे ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय से पहले खाया जाता है, जिससे व्रती महिला दिनभर बिना जल और अन्न के उपवास रख सके।

धार्मिक दृष्टि से सरगी सिर्फ ऊर्जा देने वाला भोजन नहीं, बल्कि यह पति की लंबी उम्र, घर में सुख-शांति और सास-बहू के रिश्ते में प्रेम और विश्वास की डोर को मजबूत करने वाली परंपरा है। यह यह भी दर्शाता है कि कैसे हमारी परंपराएं केवल आस्था से जुड़ी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और संबंधों की बुनियाद को भी मज़बूत करती हैं।

कैसे शुरू हुई सरगी की परंपरा?

सरगी की शुरुआत को लेकर दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं, जो इसके धार्मिक महत्व को दर्शाती हैं। पहली कथा माता पार्वती से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती ने भगवान शिव की दीर्घायु और कल्याण के लिए पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास जीवित नहीं थीं। ऐसे में उनकी मां मैना देवी ने उन्हें व्रत से पहले सरगी दी थी एक विशेष थाली जिसमें पौष्टिक और शुभ खाद्य पदार्थ थे। तभी से यह परंपरा बनी कि यदि सास जीवित न हों, तो मायके से मां भी सरगी भेज सकती हैं।
दूसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब द्रौपदी ने पांडवों की रक्षा और दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास कुंती ने उन्हें सरगी दी थी। इस प्रसंग से यह मान्यता और भी प्रबल हो गई कि सरगी ससुराल पक्ष की ओर से दी जानी चाहिए। खासकर सास की ओर से, जो इसे आशीर्वाद और प्रेम के रूप में अपनी बहू को देती है।

चन्द्रमा की पूजा क्यों है ज़रूरी

पुराणों में उल्लेख है कि सुख-सौभाग्य,उत्तम संतान,धन-धान्य,पति की रक्षा  के लिए चंद्रदेव की उपासना अच्छी मानी गई है। चंद्रमा की पूजा का एक अन्य कारण यह भी है कि चंद्रमा मन के देवता हैं। चंद्रमा की अमृतमयी किरणें मनुष्य के मन पर सर्वाधिक प्रभाव डालती हैं।

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