पीठ ने अपने 64 पेज के फैसले में कहा कि वह इस बात से अवगत है कि यह मामला 12 साल की एक मासूम बच्ची के साथ रेप और उसकी नृशंस हत्या के जघन्य कृत्य से जुड़ा है. हालांकि, आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक स्थापित सिद्धांत है कि विशुद्ध रूप से सरकमस्टेंशियल एविडेंस पर आधारित मामले में अभियोजन पक्ष को संदेह से परे साबित करना होगा…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि एक नाबालिग लड़की के साथ रेप और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक दोषी सहित दो लोगों को संदेह का लाभ देकर बरी करने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा है, क्योंकि मामले में की गई जांच घटिया है। सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों के ब्लड सैंपल कलेक्ट करने संबंधी कोई भी दस्तावेज न तो पेश किया गया और न ही साक्ष्य के तौर पर दिखाया गया, जिससे डीएनए रिपोर्ट ‘कचरे का टुकड़ा’ बन गई है. यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया।
पीठ ने अपने 64 पेज के फैसले में कहा कि वह इस बात से अवगत है कि यह मामला 12 साल की एक मासूम बच्ची के साथ रेप और उसकी नृशंस हत्या के जघन्य कृत्य से जुड़ा है. हालांकि, आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक स्थापित सिद्धांत है कि विशुद्ध रूप से सरकमस्टेंशियल एविडेंस पर आधारित मामले में अभियोजन पक्ष को संदेह से परे साबित करना होगा।
‘डीएनए रिपोर्ट रद्दी कागज’ पीठ ने कहा, “अपराध सिद्ध करने वाली परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए जो पूरी तरह से अभियुक्त के अपराध की ओर इशारा करें और उसकी निर्दोष होने या किसी और के अपराध से मेल न खाती हों.” पीठ ने कहा कि अभियुक्तों-अपीलकर्ताओं से ब्लड सैंपल कलेक्ट करने से संबंधित कोई भी दस्तावेज साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या प्रदर्शित नहीं किया गया, जिससे डीएनए रिपोर्ट रद्दी कागज बनकर रह गई।
पीठ ने कहा, “हमारा मानना है कि यह मामला घटिया जांच का एक और उत्कृष्ट उदाहरण है, साथ ही लचर सुनवाई प्रक्रिया का भी, जिसके कारण एक मासूम बच्ची के साथ क्रूर बलात्कार और हत्या से जुड़े मामले की जांच विफल हो गई।”
‘आरोपी को बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं’
पीठ ने कहा कि उसे लगता है कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों-अपीलकर्ताओं का अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है और वह भी ऐसे ठोस सबूत पेश करने में जिसे मामले को हर तरह के संदेह से परे साबित करना कहा जा सके. पीठ ने अपीलकर्ताओं को जेल से रिहा करने का आदेश देते हुए कहा, “हमारे पास अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देकर बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।”
पीठ ने कहा, “हमें यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि इस आरोप के अलावा कि पीड़ित बच्चे की चप्पलें, अंडरवियर और पानी का कनस्तर आरोपी नंबर 1-पुतई द्वारा जोते गए खेत में पाए गए थे. अभियोजन पक्ष कोई भी विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा है, जिसे संबंधित अपराध के लिए आरोपी-अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने वाला माना जा सके।”
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2018 के एक फैसले के खिलाफ अपीलों पर फैसला सुनाते हुए ये टिप्पणियां कीं. हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पुतई को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा की पुष्टि की थी और आरोपियों द्वारा अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया था. वहीं, निचली अदालत ने इस मामले में आरोपी दिलीप को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
पीठ ने कहा कि जांच अधिकारियों ने आस-पास के खेतों में जहां नाबालिग का शव मिला था, किसी से भी पूछताछ करने की जहमत नहीं उठाई. पीठ ने कहा, “अभियोजन पक्ष जांच के दौरान कथित रूप से एकत्र किए गए फोरेंसिक नमूनों की कस्टडी की चैन को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत पेश करने में विफल रहा और इसलिए केवल इसी आधार पर, डीएनए रिपोर्ट महत्वहीन हो जाती है।”
खेत में मिला था बच्ची का शव
अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि पुलिस के कुत्ते ने अपराध स्थल पर मिली एक छोटी नर कंघी को सूंघा, जो दिलीप के घर तक ले गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा बरामद कंघी के रंग को लेकर महत्वपूर्ण विरोधाभासों को रेखांकित किया. बता दें कि पीड़िता 4 सितम्बर 2012 को लापता हो गई थी. उसका शव एक खेत में मिला था, जिसके बाद अपीलकर्ताओं को सितम्बर 2012 में गिरफ्तार कर लिया गया था।















