BREAKING

खास खबरघर-परिवारदेश-दुनियाफीचर्ड

शारदीय नवरात्रि का आज आठवां दिन: ये है अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त

आज 22 अक्टूबर को सवार्थ सिद्ध यानी सभी कार्यों के लिए स्वंय सिद्ध मुहूर्त है. 23 अक्टूबर को बुधादित्य योग, पराक्रम योग, शूलयोग के साथ दूसरा सर्वार्थ सिद्ध योग का संयोग बन रहा है…

नईदिल्ली (ए)। आज रविवार 22 अक्टूबर के आश्विन शुक्ल पक्ष की ‘दुर्गाष्टमी’ है, शारदीय नवरात्रा में यह दिन सर्वाधिक शुभ, विशेष महत्वपूर्ण है. इस दिन नौ कन्याओं की पूजा का विधान है, इनकी नौ देवियों के रूप में आदर सत्कार किया जाता है. अपनी परम्परा के अनुसार कुछ लोग नवरात्रा की अष्टमी को तथा कुछ लोग नवमी को मां दुर्गा की विशेष पूजा तथा हवन करने के बाद कन्या पूजन करते हैं। नवरात्रि की महाअष्टमी 22 अक्टूबर और महानवमी तिथि 23 अक्टूबर को है . अष्टमी तिथि पर मां दुर्गा की. आठवीं शक्ति महागौरी और नवमी तिथि पर मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. इन तिथियों पर बेहद शुभ भी बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है।

कन्या पूजन का ये है श्रेष्ठ मुहूर्त 22 अक्टूबर को सवार्थ सिद्ध यानी सभी कार्यों के लिए स्वंय सिद्ध मुहूर्त है. साथ इस दिन पराक्रम योग, बुधादित्य योग धृति योग भी है. वहीं 23 अक्टूबर को बुधादित्य योग, पराक्रम योग, शूलयोग के साथ दूसरा सर्वार्थ सिद्ध योग का संयोग बन रहा है. वहीं अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 15 मिनट से 12 बजकर 15 मिनट तक रहेगा. इसके बाद दोपहर 2 से 3 बजे तक रहेगा . फिर नवमी तिथि पर सुबह 10 बजकर 15 मिनट से 11 बजकर 15 मिनट तक. इसके बाद दोपहर 4 से 6 बजे तक रहेगा।

भैरव पूजा के बिना मां की पूजा अधूरी है दो से नौ वर्ष की आयु की कन्याओं का ही पूजन हों तथा साथ में एक बटुक भी यानि की नौ कन्याओं के साथ एक बटुक रूप बालक अवश्य होना चाहिए, क्योंकि मां की पूजा भैरव पूजा के बिना अधूरी है. इसी प्रकार कन्या पूजन में भी एक बटुक होना अनिवार्य है. दो वर्ष की कन्या को कुमारी, तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कन्या को कल्याणी, पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी, छह वर्ष की कन्या को कालिका, सात वर्ष की कन्या को शाम्भवी तथा आठ वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहा गया है।

नौ कन्याओं को मां के नौ रूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा माता सिद्धिदात्री जानकर उनकी पूजा करने से दुःख – दरिद्रता का नाश होता है. मां शत्रुओं का क्षय तथा भक्तों की आयु, धन तथा बल में वृद्धि करती हैं।

शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन की अधिष्ठात्री देवी हैं मां महागौरी. नवदुर्गा ग्रंथ (एक प्रतिष्ठित प्रकाशन) के अनुसार इनका नाम महागौरी इनके ’गौर’ (गोरा) वर्ण के कारण पड़ा है. नारद के कहने पर इन्होंने भगवान महादेव से विवाह करने का संकल्प लिया था. इसके लिए इन्होंने कठोर तपस्या भी की थी. इस कठोर तपस्या के फलस्वरूप इनका रंग काला हो गया. जब भगवान महादेव तपस्या से प्रसन्न होकर वर देने आए तब गंगाजल से धोकर पार्वती जी के शरीर की कालिमा समाप्त की. तुलसीदास जी ने अपनी रचना में पार्वती की तपस्या का उल्लेख किया है. इनके गोरा रंग की तुलना शंख और चन्द्रमा से की जाती है।

किशोरी अवस्था में माता वेश्वेत वस्त्र धारण करती थी. इनकी चार भुजाएं हैं. दाहिनी तरफ ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में और नीचे वाला हाथ त्रिशूल पकड़े हुए है. ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाला अभय मुद्रा में है. इनका वाहन वृषभ है. इनका प्रार्थना मन्त्र है:–

श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः ।।महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

महागौरी की उपासना श्रेष्ठ फलदायिनी है. इनकी उपासना से सारे ताप और कलुषता समाप्त हो जाते हैं. यहां तक की जन्म जन्मांतर से संचित पाप समाप्त होते हैं. इसके साथ ही आनेवाले पापों के पहले से नष्ट हो जाने की संभावना बनती है. अक्षय पुण्यों का उदय होता है. मन से की गई पूजा का देवी की तरफ से अपार फल देनेवाला होता है. इनकी शरणागति हमारे लिए सत्त का द्वार खोलता है।

देवी पुराण के अनुसार आज के दिन कन्याओं का भोजन करवाना चाहिए. स्त्रियां आज की दिन बैंगनी रंग के वस्त्र पहनती हैं. कई लोग आज ही के दिन हवन और कन्या पूजन भी कराते हैं।

Related Posts