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सुप्रीम कोर्ट की सुप्रीम टिप्पणी, कहा- हर समस्या के लिए रामबाण नहीं हो सकता सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि अदालत कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। पीठ ने कहा कहा, क्या कानून बनाने के लिए कोई आदेश हो सकता है? क्या हम सरकार को विधेयक पेश करने का निर्देश दे सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट हर चीज के लिए रामबाण नहीं हो सकता है…

नईदिल्ली (ए)। स्क्रीनिंग में बच्चों या उनके अभिभावकों से साक्षात्कार लिया जाता है। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि अदालत कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। पीठ ने कहा कहा, क्या कानून बनाने के लिए कोई आदेश हो सकता है? क्या हम सरकार को विधेयक पेश करने का निर्देश दे सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट हर चीज के लिए रामबाण नहीं हो सकता है।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने गत तीन जुलाई को गैरसरकारी संस्था सोशल ज्यूरिस्ट की तरफ से दायर एक जनहित याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि वह विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप और उपराज्यपाल को दिल्ली स्कूल शिक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015 को मंजूरी देने या उसे लौटाने का निर्देश नहीं दे सकता। इस आदेश के खिलाफ सोशल ज्यूरिस्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

वर्षों से बेवजह लटका है विधेयक
वकील अशोक अग्रवाल की तरफ से दायर एनजीओ की याचिका में कहा गया था कि नर्सरी दाखिले में स्क्रीनिंग प्रक्रिया पर प्रतिबंध वाला बाल-हितैषी विधेयक पिछले सात वर्षों से बेवजह ही केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लटका है। याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि उसके लिए यह उचित नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए ऐसे मामले में सांविधानिक प्राधिकार (उपराज्यपाल) को निर्देश दे।

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