संन्यास की ओर
कोई संन्यासी क्यों बनता है?- लड़ाई जैसी बहस के बाद, ऑफिस से पैदल निकलते ही वो इस ख़्याल की गली में मुड़ गया। ज्ञान पाने के लिए? या आसक्ति से मुक्ति के लिए, या बस मुक्ति के लिए? “हर चीज़ से मुक्ति, शायद ज्ञान से भी?
परंतु विद्वान लोग मुझ जैसे मध्यमवर्गीय, हर तरफ़ से असुरक्षा-भावना से ग्रसित, आम से दिखने वाले, बेहद आम आदमी के ढंग से नहीं सोचते”, उसकी चेतना ने उसके ही प्रश्न के उत्तर में नकारात्मक प्रतिवाद किया, ” तभी तो, सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने संन्यास को भौतिक आकांक्षाओं और पूर्वाग्रह का त्याग, विरक्ति सहित शांतिपूर्ण, आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति का माध्यम बताया है”। उसने जैसे इस परिभाषा को झिड़क दिया, “हुँह, आध्यात्मिक लक्ष्य?”
चलते चलते वो सड़क के किनारे एक चाय की दुकान पे रुककर बैठ गया, चाय परोसते गंदे कपड़े पहने एक किशोर की ओर देखने लगा, जिसे दुकान का मालिक तेज़ काम करने के लिए डाँट रहा था। उसकी विचार-श्रृंखला फिर गतिमान हुई। वो उस किशोर की ओर देखते हुए, शून्य को घूरता सोचने लगा, “सही बात तो ये है कि आम आदमी संन्यास को तब सोचता है, जब उसे भागना होता है, पलायन करना होता है। जब उसकी इच्छाएँ उससे नहीं सम्हलतीं, जब वो दुत्कार दी जाती हैं, तब इच्छा रहित होना संन्यास नहीं पलायन है।
जब अपेक्षायें निर्दयता से मार के भगा दी जाती हैं, तब अपेक्षारहित होना, पलायन है। जब उसे अपराध बोध होता है, तो प्रायश्चित की ओर भागता है। जब नैतिकता कृत्रिम, नियम पुरातन, पर ज़रूरतें बौद्धिक और नवीन होतीं हैं, तो विरोधाभासों, मजबूरियों से भागता है। जब लाइफ़ बिच्छू की तरह हर पल दुख का डंक मारती है ना, तो भागना चाहता है आम आदमी, संन्यास की ओर।”
विशेष लेख: IPS मयंक श्रीवास्तव (छग) के फेसबुक वॉल से…









