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राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर मचे घमासान पर बोले मूर्तिकार: फोटो गलत एंगल से ली गई, कोई बदलाव नहीं हुआ

राष्ट्रीय प्रतीक बेहद शुद्ध कांस्य से बना है जिसका कुल वजन 9500 किलोग्राम है, इसकी ऊंचाई 6.5 मीटर है, यह प्रतीक सम्राट अशोक की सारनाथ राजधानी में मौजूद प्रतीक की कॉपी है…

 

नईदिल्ली (ए)। संसद भवन की नई इमारत पर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न का अनावरण होते ही यह चर्चा का विषय बन गया। प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को पूजा-पाठ के बाद इसका उद्घाटन किया। अब विपक्ष का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीक में फेरबदल किया गया है। इसमें बने हुए शेर सारनाथ में स्थित स्तंभ से अलग हैं। कई नेताओं का कहना है कि सेंट्रल विस्टा की छत पर स्थापित राष्ट्रीय प्रतीक के शेर आक्रामक मुद्रा में नजर आते हैं जबकि ओरिजिनल स्तंभ के शेर शांत मुद्रा में हैं। यह विवाद टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के ट्वीट के बाद शुरू हो गया जब उन्होंने कहा कि अब सत्यमेव जयते से सिंहमेव जयते की ओर जा रहे हैं।

विपक्षी दलों और कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को सरकार पर राष्ट्रीय प्रतीक को बदलने का आरोप लगाया। उन्होंने इसे तत्काल बदलने की मांग की। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने अशोक की लाट के ‘मोहक और राजसी शान वाले’ शेरों की जगह ‘उग्र शेरों’ का चित्रण कर राष्ट्रीय प्रतीक को बदल दिया है। हालांकि नए संसद भवन की छत पर लगे राष्ट्रीय प्रतीक को बनाने वाले मूर्तिकार का कुछ और ही कहना है। औरंगाबाद के मूर्तिकार सुनील देवरे ने यह राष्ट्रीय प्रतीक बनाया है। उन्होंने मंगलवार को विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि प्रतीकों में कोई स्पष्ट बदलाव नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण किया था।

राष्ट्रीय प्रतीक बेहद शुद्ध कांस्य से बना है जिसका कुल वजन 9500 किलोग्राम है। इसकी ऊंचाई 6.5 मीटर है। यह प्रतीक सम्राट अशोक की सारनाथ राजधानी में मौजूद प्रतीक की कॉपी है। टाइम्स नाउ से बात करते हुए, देवरे ने कहा, “असली प्रतीक 7 फीट ऊंचा है जबकि नया प्रतीक लगभग 7 मीटर (लगभग 21 फीट) ऊंचा है। वायरल हो रहे प्रतीक चिन्ह की तस्वीर जमीनी स्तर से ली गई है और जब आप इसे उस एंगल से देखते हैं तो इसका कैरेक्टर बदला हुआ नजर आता है।” उन्होंने कहा, “मैंने सही ढंग से स्टडी करने के बाद राष्ट्रीय प्रतीक को बनाया है। मुझे टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड द्वारा प्रतीक बनाने का काम दिया गया था और मुझे सरकार से कोई निर्देश नहीं मिला।”

इससे पहले लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ट्वीट किया, ‘‘नरेंद्र मोदी जी, कृपया शेर का चेहरा देखिए। यह महान सारनाथ की प्रतिमा को परिलक्षित कर रहा है या गिर के शेर का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। कृपया इसे देखिए और जरूरत हो तो इसे दुरुस्त कीजिए।’’ विपक्ष ने मोदी पर संविधान के नियमों को तोड़ने और समारोह में विपक्षी नेताओं को आमंत्रित नहीं करने के लिए निशाना साधा।

विपक्ष के आरोपों को लेकर जब सुनील से पूछा गया कि क्या शेरों के मुंह ज्यादा खुले हैं? इस पर उन्होंने कहा कि हमें एक स्पष्ट ब्रीफ दिया गया था। इस विशालकाय अशोक स्तंभ बनाने में हमे 9 महीने के करीब लग गए। सरकार से कोई हमे सीधा कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिला था। हमने किसी के कहने पर कोई बदलाव नहीं किया है। सारनाथ में मौजूद स्तंभ का ही ये कॉपी है।

क्या है अशोक स्तंभ का इतिहास? सम्राट अशोक मौर्य वंश के तीसरे शासक थे। उन्हें सबसे शक्तिशाली शासकों में गिना जजाता है। उनका जन्म 304 ईसा पूर्व हुआ था। उनका साम्राज्य तक्षशिला से लेकर मैसूर तक फैला हुआ था। पूर्व में बांग्लादेश से पश्चिम में ईरान तक उनका राज्य था। सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य में कई जगहों पर स्तंभ स्थापित करवाकर यह संदेश दिया था कि यह राज्य हमारे अधीन है। कई जगहों पर अशोक के बनवाए स्तंभ मिले हैं जिनमें शेर की आकृति बनी है। लेकिन सारनाथ और सांची में उनके स्तंभ में शेर शांत दिखते हैं। माना जाता है कि ये दोनों प्रतीक उनके बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद बनवाए गए।

सम्राट अशोक ने अपने जीवनकाल में कई युद्ध लड़े। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा काम किया और तक्षशिला, विक्रमशिला और कांधार विश्वविद्यालय स्थापित करवाए। 261 ईसा पूर्व जब कलिंग के युद्ध में भारी नरसंहार हुआ तो सम्राट अशोक को बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने हथियार रखने का फैसला कर लिया। उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद भी उन्होंने अशोक स्तंभ बनवाए जिसमें शेरों की छवि को शांत और सौम्य बनाया गया।

क्या है संदेश? सारनाथ के अशोक स्तंभ को 26 अगस्त 1950 में राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया। महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों, मुद्राओं पर अशोक स्तंभ दिखायी देता है। यह प्रतीक सम्राट अशोक की युद्ध और शांति की नीति को दर्शाता है। इसमें के चार शेर आत्मविश्वास, शक्ति, साहस और गौरव को दिखाते हैं। वहीं इसमें नीचे की तरफ एक बैल और घोड़ा बना है। बीच में धर्म चक्र है। पूर्वी भाग में हाथी और पश्चिम में बैल है। दक्षिण में घोड़े और उत्तर में शेर है। इनके बीच में चक्र बने हुए हैं। इसी चक्र को राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया गया है। स्तंभ में नीचे सत्यमेव जयते लिखा गया है जो कि मुंडकोपनिषद का एक सूत्र है।

क्या कहता है कानून?
अशोक स्तंभ को जब राष्ट्रीय प्रतीक माना गया तो उसको लेकर कुछ नियम भी बनाए गए। अशोक स्तंभ का इस्तेमाल सिर्फ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही कर सकते हैं। इसमें भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, विधाक, राज्यपाल, उपराज्यपा और उच्च अधिकारी शामिल हैं। राष्ट्रीय चिह्नों का दुरुपयोग रोकने केलिए भारतीय राष्ट्रीय चिह्न (दुरुपयोग रोकथाम) कानून 2000 बनाया गया। इसे 2007 में संशोधित किया गया। इसके मुताबिक अगर कोई आम नागरिक अशोक स्तंभ का उपयोग करता है तो उसको दो साल की कैद या 5 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

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