कोसा- मयंक श्रीवास्तव (आईपीएस – छत्तीसगढ़)
आज पूजा थी। क्या पहनें कि आराम रहे, क्या पहनें कि प्रार्थना में शुद्धता बनी रहे, ये सोच रहा था। मुश्किल नहीं था इसे चुनना क्यूँकि कोसा सिल्क से बेहतर कुछ और नहीं, कोसा हर मांगलिक कार्य पर पहनना शुभ माना जाता है। हमारे बुनकर वस्त्र में जो स्थानीय वनस्पति और जीवजंतु के मोटिफ़ का पुट रखते हैं, वो भी हर वस्त्र को अनुपम बना देता है।फिर आप कोई भी उपमा यूँ नहीं देंगे कि वो कोसा रेशम का कपड़ा उसकी तरह मुलायम है, बल्कि आप ये बोलना ज़्यादा पसंद करेंगे कि वो उतनी ही कोमल है, उसका मन उतना ही शुद्ध है जैसे कोसा सिल्क। हाँ, कोसा की उपमा नहीं, कोसा से उपमाएँ हैं।
छत्तीसगढ़ में कितनी आकर्षक चीज़ें हैं, जो इसे भारत का अद्भुत प्रदेश बनाती हैं।उनमें से एक है- “कोसा”। एक तरह का टसर रेशम है ये, जो ऐंथेरिया वंश (GENUS) के कीड़ों द्वारा बनाया जाता है, विशेषतः यहाँ ये ऐंथेरिया मिलिटा (या ANTHERAEA MYLLITOIDES) कीट। ये रेशम-कीट अर्जुन, साल या साजा के वृक्ष पर ककून बनाते हैं। कोसा को जो अद्वितीय बनाते हैं वो हैं इसकी मुलायमियत और शुद्धता। सागौन के रंग के, या डल सुनहरे या क्रीम रंग के इसके धागों से कपड़े बनाना इतना आसान नहीं क्यूँकि ये कीट बहुत आसानी से नहीं मिलते। चांपा और कोरबा इसके दो सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। कहते हैं, असली कोसा को पहचानना हो तो उसके धागे को जलाने पर काला अवशिष्ट, जिसकी गंध उतनी अच्छी नहीं लगेगी, मिलेगा। चूँकि यह उत्पाद छत्तीसगढ़ की विशेषता है, अतः भारत सरकार से चांपा रायगढ़ हथकरघा कोसा बुनकर कल्याण समिति के आवेदन पर भारत सरकार ने कोसा रेशम साड़ी को GI टैग (GEOGRAPHICAL इंडिकेटर टैग) मिला है।














