नईदिल्ली (ए)। एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को अगले दस सालों में आधे से भी कम करना होगा। यदि दुनिया के सभी देश यह लक्ष्य तय नहीं करते हैं तो मौजूदा रफ्तार से दुनिया को कार्बन मुक्त होने में 150 साल लग जाएंगे। लांसेट काउंटडाउन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बेरोकटोक उत्सर्जन जारी रहने और कोरोना के बाद निराशाजनक ग्रीन रिकवरी ने भविष्य को लेकर असमंजस पैदा कर दिया है। इसलिए जलवायु मोर्चे पर आने वाला वक्त जोर आजमाइश भरा रहेगा।
रिपोर्ट के अनुसार यह तो तय है कि दुनिया की तमाम सरकारें पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों को पूरा करती नहीं दिखतीं है। मौजूदा साक्ष्य स्पष्ट करते हैं कि बदलती जलवायु के स्वास्थ्य पर विनाशकारी प्रभाव और उससे जुड़ी मौतों के सिलसिले को रोकने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को डेढ़ डिग्री तक सीमित करना होगा। लेकिन इस बात के भी साक्ष्य मौजूद हैं कि इस सदी के अंत तक दुनिया में तापमान पूर्व औद्योगिक स्तरों से 2.7-3.1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाने के रास्ते पर है। इसलिए मौजूदा लक्ष्यों को नए सिरे से निर्धारित करने की जरूरत है।
रिपोर्ट बताती है कि 2020 में रिकार्ड तापमान बढ़ोतरी के फलस्वरूप 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के 3.1 अरब अधिक व्यक्ति-दिन और छोटे बच्चों के 62.6 करोड़ अधिक व्यक्ति-दिवस प्रभावित हुए। यानी इतने दिन उन्होंने ज्यादा गर्मी का सामना किया। 2021 में अब तक 65 वर्ष से अधिक या एक वर्ष से कम उम्र के लोग, सामाजिक असमानता का सामना करने वाले लोगों के साथ, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के प्रशांत उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में जून, 2021 में 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक के रिकॉर्ड-तोड़ तापमान से सबसे अधिक प्रभावित हुए थे।
औसत संभावित कमाई का नुकसान हुआ:
रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र परिभाषित मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के निम्न और मध्यम स्तर वाले देशों में पिछले 30 वर्षों के दौरान गर्मी की चपेट में सबसे अधिक वृद्धि हुई है। निम्न और मध्यम एचडीआई वाले देशों में कृषि श्रमिक अत्यधिक तापमान के संपर्क में आने से सबसे बुरी तरह प्रभावित थे, जो 2020 में गर्मी के कारण खोए हुए 295 अरब संभावित काम के घंटों में से लगभग आधा था। ये खोए हुए काम के घंटे बताते हैं कि देशों में औसत संभावित कमाई का नुकसान हुआ है। निम्न एचडीआई समूह में राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद के 4-8% के बराबर थे। बढ़ता तापमान और बदलता वर्षा पैटर्न दुनिया में खाद्य और पानी की असुरक्षा से निपटने में प्रगति के वर्षों को उलटने लगा है। 2020 में किसी भी महीने के दौरान वैश्विक भूमि की सतह का 19% तक अत्यधिक सूखे से प्रभावित था जबकि यह 1950-1999 के बीच 13 फीसदी से अधिक नहीं था।
एक नजर भारत पर:
भारत में 2019 में अत्यधिक गर्मी की चपेट में आने की संभावना लगभग 31 फीसदी थी जो 1990 की तुलना से 15% अधिक है। भारत उन पांच देशों में से एक है जहां पिछले 5 वर्षों में अतिसंवेदनशील आबादी सबसे अधिक खतरे पर हैं, और ये खतरा आगे की और बढ़ रहा है। वास्तव में, 2016-2020 के दौरान, 1986-2005 बेसलाइन की तुलना में, 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के औसतन 44. करोड़ अधिक दिन हीटवेव एक्सपोजर के थे। 1 वर्ष से कम आयु के लोगों के संबंध में, 1986-2005 की आधार रेखा की तुलना में, 1 वर्ष से कम उम्र के लोगों के औसतन 1.5 करोड़ अधिक दिन हीटवेव एक्सपोजर थे। भारत ने 2020 में 113 अरब घंटे से अधिक संभावित श्रम खो जाने का अनुभव किया, जिसका अर्थ 1990-1994 के औसत की तुलना में 82% की वृद्धि है। इस देश में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के कुल घंटों में से आधे से ज्यादा का नुकसान हुआ है।















